भिलाई नगर, 08 अप्रैल। दुर्ग जिले के गलियारों में इन दिनों गर्मी से ज्यादा चर्चा आबकारी विभाग की ‘ठंडी वसूली’ की है। खबर उड़ती-उड़ती आई है (और अब तो जम गई है) कि जिले के आबकारी महकमे ने एक नया ‘जुगाड़ टैक्स’ ईजाद कर लिया है। नाम दिया गया है— ‘दो लाख वाला फॉर्मूला’। (What is this ‘unspoken rule’?)

लाइसेंस मिला नहीं कि ‘दक्षिणा’ हाजिर….!
किस्सा कुछ यूं है कि हाल ही में बीयर बार और रेस्टोरेंट के लाइसेंस रिन्यू हुए। संचालकों को लगा कि सरकारी फीस भर दी, अब चैन से धंधा करेंगे। (What is this ‘unspoken rule’?)

पर साहब, असली खेल तो रिन्यूअल के बाद शुरू हुआ…!
चर्चा है कि विभाग के साहबों ने अपनी डायरी का वो ‘अघोषित नियम’ खोल दिया, जिसमें लिखा है— “लाइसेंस चाहिए तो दो लाख की भेंट चढ़ानी होगी।”

बताया जा रहा है कि बेचारे 50 के करीब बार संचालक, ‘साहब’ की नाराजगी मोल न लेने की मजबूरी में दो-दो लाख के लिफाफे थमा चुके हैं। अब गणित लगाइए, 50 बार और 2 लाख प्रति बार… यानी 1 करोड़ का ‘जैकपॉट’! ###
खजाना किसका भरा…? सरकारी या ‘पर्सनल’….? What is this ‘unspoken rule’?
सबसे मजेदार सवाल तो यही उठ रहा है कि ये भारी-भरकम राशि आखिर गई किस ‘तिजोरी’ में…? सरकारी चालान का तो कहीं नामोनिशान नहीं है, तो क्या ये पैसे सीधे अधिकारियों के ‘रिटायरमेंट प्लान’ में जमा हो रहे हैं…?
साहबों की ‘साफ शर्ट’ पर दाग के छींटें!
इस पूरे खेल ने दो बड़े नामों की नींद उड़ा दी है। एक तरफ आबकारी आयुक्त आर संगीता हैं, जिनकी छवि लोहे जैसी मजबूत और ईमानदार मानी जाती है।
दूसरी तरफ कलेक्टर अभिजीत सिंह हैं, जिनकी ‘क्लीन इमेज’ के चर्चे रायपुर तक हैं।
यह सुगबुगाहट और चर्चा धीरे धीरे प्रशासनिक विभागों तक जा पहुंची है। गाहे-बगाहे पतासाजी भी की जा रही है कि यह महज अफवाह फैली है या फिर कुछ हुआ ही है ऐसा..? कहीं बार संचालकों का नया दांव तो नहीं…? या फिर आबकारी विभाग ने सुचमुच ऐसा कोई दांव खेल ही दिया है…?
What is this ‘unspoken rule’?अधिकारी बोले— ‘नो कमेंट्स’
CG Bhaskar ने जब इस बारे में कुछ बार संचालकों से सच जानना चाहा तो वो व्यवसाय की दलील देते किसी और से पूछने की राय देने लगे। जब आबकारी विभाग में अधिकारियों से सच जानने को फोन लगाया गया, तो यकीन मानिए नेटवर्क ‘बयान देने अधिकृत न होने‘ की दुहाई देते कवरेज क्षेत्र से बाहर हो गया! उनका पक्ष नहीं मिल पाया, जो अपने आप में एक बड़ा जवाब हैं।
बार संचालक भी तो चुप्पी साधे बैठे हैं, खुलकर कोई बोलना नहीं चाहता क्योंकि धंधा उन्हीं के भरोसे है इसलिए पानी में रह कर……..! कहावत को चरितार्थ करने सभी लामबंद हैं।
जब देने वालों की खामोशी खुल कर आवाज़ नहीं बनेगी तो लेने वाले हमेशा “सुभान अल्लाह……” खैर जो भी हो लेकिन जब खामोशी की जुबान सुगबुगाने लगे तो राज खुल कर “चर्चा” बन जाता है और हो भी वही रहा है।
आज की ताजा गपशप:
लोग पूछ रहे हैं— “ये दो लाख की रसीद क्या ऊपर वाले के यहाँ मिलेगी, या फिर ये केवल ‘साहब’ के आशीर्वाद का शुल्क है?”
इस चर्चा में कितनी सच्चाई है? यह तो बार संचालक और आबकारी विभाग ही जानें क्योंकि खबर तो जमकर उड़ी है और विश्लेषण भी हो रहा है।
कोई भी खुल कर बोलने तैयार नहीं, फिर सोशल मीडिया से लेकर चौक चौराहों और बार के गलियारों तक इसकी भनक क्यों और कैसे भुनभुनाने लगी है, यह तफ्तीश का विषय हो सकता है। मामला जो भी हो, संजीदा है। जानकार यहां तक बोल रहे कि आला कप्तानों की नाक के नीचे यह कैसा ‘वसूली उत्सव’ चला जिसने प्रशासन की साख को चैलेंज कर दिया।
अब देखना ये है कि इस ‘करोड़पति खेल’ पर प्रशासन की गाज गिरती है या फिर ये ‘अघोषित नियम’ दुर्ग का नया कानून बन जाएगा!
इस चर्चा में क्या और कितना सच है या कितनी अफवाह इसका आंकलन जांच और तफ्तीश से ही संभव है। खैर बात निकली ही है-तो शायद दूर तलक जाए ही। बस समय का इंतजार है, वो बता सकता है कि सच क्या है या फिर ऐसा भी हो सकता है कि समय के पास “समय” ही न हो।


