सीजी भास्कर, 08 मई : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत निजी स्कूलों (HC RTE Admission Negligence) में होने वाले दाखिलों में बरती जा रही लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि प्रदेश के 387 स्कूलों में प्रवेश के लिए एक भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। इनमें राज्य के कई प्रतिष्ठित और बड़े निजी स्कूल भी शामिल हैं।
चीफ जस्टिस ने पूछा- क्या सरकार कुछ छिपा रही है
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने सरकार के हलफनामे पर हैरानी जताते हुए तीखे सवाल किए। कोर्ट ने पूछा कि क्या वाकई गरीब बच्चे बड़े स्कूलों में शिक्षा प्राप्त नहीं करना चाहते या फिर राज्य सरकार तथ्यों को छिपाने की कोशिश कर रही है। हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए शिक्षा सचिव को 10 जुलाई तक विस्तृत शपथ पत्र के साथ जवाब पेश करने का सख्त निर्देश दिया है।
कहीं शून्य तो कहीं सिर्फ एक आवेदन
जनहित याचिका (HC RTE Admission Negligence) पर सुनवाई के दौरान सरकार ने बताया कि न केवल 387 स्कूलों में आवेदन शून्य हैं, बल्कि 366 स्कूल ऐसे भी हैं जहां सीटों की तुलना में आवेदनों की संख्या बेहद कम है। कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए पूछा कि यदि किसी स्कूल में सीटों के मुकाबले महज एक या दो आवेदन आए हैं, तो क्या वहां की शिक्षा व्यवस्था और प्रक्रिया में कोई बड़ी खामी है?
ऑनलाइन पारदर्शी व्यवस्था बनाने के निर्देश
हाई कोर्ट (HC RTE Admission Negligence) ने प्रशासनिक सुस्ती पर चिंता जताते हुए स्पष्ट किया कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बावजूद दाखिला प्रक्रिया का अधर में लटकना हजारों बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निम्नलिखित निर्देश दिए हैं। RTE के तहत आवंटित सभी सीटों की जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक की जाए।
प्रत्येक स्कूल की कुल तय सीटों और उनमें हुए वास्तविक दाखिलों का पूरा ब्यौरा पेश किया जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों का लाभ पात्र बच्चों को मिले। हाई कोर्ट ने याद दिलाया कि कानूनन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए निजी स्कूलों में आरक्षण अनिवार्य है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।


