सीजी भास्कर, 16 जून : खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही पाटन विधानसभा क्षेत्र समेत दुर्ग जिले के कई इलाकों में किसानों को खाद, बीज और डीएपी की कमी का सामना करना पड़ रहा है (Fertilizer Crisis)। किसानों की लगातार मिल रही शिकायतों के बीच पूर्व मुख्यमंत्री और पाटन विधायक भूपेश बघेल ने विभिन्न सहकारी समितियों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया और किसानों को पर्याप्त खाद उपलब्ध नहीं होने पर सरकार को घेरा।
किसानों ने बताई खाद और बीज की किल्लत
भूपेश बघेल ने पंडहोर, सोमनी, फेकारी, गाड़ाडीह, कुम्हली, जामगांव आर, बेलहारी निपानी, रानीतराई और सेलूद सहित कई सहकारी समितियों का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने किसानों से सीधे चर्चा कर खाद, बीज और ऋण वितरण की स्थिति की जानकारी ली।
किसानों ने बताया कि समय पर खाद और बीज उपलब्ध नहीं होने से खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। कई किसान ऋण पुस्तिका लेकर समितियों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें जरूरत के मुताबिक खाद नहीं मिल पा रही है।
डीएपी की कमी पर उठाए सवाल
निरीक्षण के बाद भूपेश बघेल ने कहा कि कई समितियों में डीएपी की भारी कमी बनी हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान वितरण व्यवस्था किसानों के हित में नहीं है। उनके अनुसार छोटे और बड़े किसानों को समान मात्रा में खाद दिए जाने से अधिक रकबे वाले किसानों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।
उन्होंने डीएपी के विकल्प के रूप में एनपीके खाद दिए जाने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि एनपीके खाद किसानों के लिए अधिक महंगी पड़ रही है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है और किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
समितियों में व्यवस्था सुधारने की मांग
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि खरीफ सीजन के दौरान खाद और बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध नहीं कराई गई तो इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ सकता है। उन्होंने किसानों की समस्याओं का जल्द समाधान करने और सहकारी समितियों में पर्याप्त खाद उपलब्ध कराने की मांग की।
प्राकृतिक खेती अपनाने की सलाह
खाद संकट के मुद्दे पर विधानसभा अध्यक्ष Raman Singh ने किसानों से प्राकृतिक और जैविक खेती (Fertilizer Crisis) को अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि डीएपी, यूरिया और अन्य रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग का असर मिट्टी की उर्वरा शक्ति और मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। उन्होंने किसानों को गोबर खाद और प्राकृतिक संसाधनों के अधिक उपयोग की सलाह देते हुए कहा कि इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होगी, उत्पादन टिकाऊ बनेगा और रासायनिक खादों पर निर्भरता भी कम होगी ।





