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Home » ब्रह्मोस के पूर्व CEO डॉ. सुधीर मिश्रा का बयान: पहले मिसाइल आयात करते थे, अब निर्यात कर रहे हैं

ब्रह्मोस के पूर्व CEO डॉ. सुधीर मिश्रा का बयान: पहले मिसाइल आयात करते थे, अब निर्यात कर रहे हैं

By Newsdesk Admin 27/06/2025
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सीजी भास्कर, 27 जून |

भारत आने वाले तीन सालों में स्वनिर्मित हाइपरसोनिक मिसाइल बनाने में सक्षम होगा। इन तीन सालों में ब्रह्मोस नेक्स्ट जनरेशन को भी डेवलप कर लिया जाएगा, जो एक साथ पांच मिसाइल ले जाने में सक्षम होगा। ब्रह्मोस के पूर्व सीईओ व डीआरडीओ के सलाहकार रक्षा वैज्ञानिक डॉ. सुधीर मिश्रा ने ये जानकारी दी।

अटल बिहारी वाजपेयी यूनिवर्सिटी के स्थापना दिवस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बिलासपुर पहुंचे डॉ. मिश्रा ने बातचीत में कहा कि 50 सालों से भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है। अब हमारे देश के वैज्ञानिकों को इतना विश्वास हो गया है कि हम किसी भी प्रकार की मिसाइल बना सकते हैं। पेश है बातचीत के अंश…

ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल को ज्यादा पॉवरफुल बनाने किस तरह के शोध चल रहे हैं? जवाब: डीआरडीओ ने दो महीने पहले हाइपरसोनिक जिसे स्क्रैमजेट हाइपरसोनिक इंजन कहते हैं, का परीक्षण किया है। यह लगभग एक हजार सेकंड चला। एक हजार सेकंड बहुत लंबा समय होता है। पहले तो हम उसको बीस सेकंड चला पाते थे। बीस सेकंड से एक हजार सेकंड पहुंच गए। एक हजार पहुंचा तो दो हजार भी पहुंचेगा।

ये रिसर्च एंड डेवलपमेंट का एक तरीका है। अब उस इंजन के चारों ओर हम एक मिसाइल विकसित कर सकते हैं। लगभग तीन साल के अंदर एक हाइपरसोनिक मिसाइल जो भारत में स्वनिर्मित होगी और हमारी अपनी टेक्नोलॉजी से बनी होगी, बना पाएंगे। इसी तरह ब्रह्मोस एनजी (नेक्स्ट जनरेशन) बना रहे हैं।

आज सुखोई 30 पर जो मेन ब्रह्मोस है, वह एक ही जा पाती है। ये बन जाएगी तो पांच जा पाएगी। उनका वेट 1200-1300 किलो होगा। ये कोशिश चल रही है। इसमें भी ढाई-तीन साल लगेंगे। इसके डिजाइन पर काम चल रहा है। इसके बाद प्रोटोटाइप बनेगा, फिर टेस्ट करेंगे।

रक्षा संसाधनों के मामले में हम कितने सक्षम हैं या कब तक सक्षम हो जाएंगे।

जवाब: सक्षम होना एक प्रोसेस है। आप ये नहीं कह सकते कि अब हम सक्षम हो गए तो हम रुक जाते हैं। ये एक कंटीन्यूअस प्रोसेस है। हम पिछले 50 सालों से काम कर रहे थे। 50 सालों से काम करने का फल अभी मिला है। अभी भी हम जो काम कर रहे हैं, उसका फल पांच साल, दस साल बाद मिलेगा।

आज हम चौथी अर्थ व्यवस्था हैं। तीसरी भी हो जाएंगे। दूसरी भी हो जाएंगे। जैसे-जैसे हम आर्थिक रूप से बढ़ते जाएंगे। उस तरीके से हम सक्षम भी होते जाएंगे। एक जमाने में तो हम कुछ भी नहीं बनाते थे। आज हम मिसाइल बना रहे हैं, तोप बना रहे हैं, युद्ध पोत बना रहे हैं। रक्षा क्षेत्र में ठहराव नहीं होता है। उसमें टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट एक सतत प्रक्रिया है। हम कुछ इम्पोर्ट करेंगे, कुछ एक्सपोर्ट करेंगे।

कौन से रक्षा उपकरणों के मामले में अब हम आत्मनिर्भर हैं।

जवाब: हमारे देश में तेजस बनना शुरू हो गया है। सरकार ने एडवांस मिडियम कॉम्बेट एयरक्राफ्ट के लिए फंड दे दिया है। पांच एयरक्राफ्ट बनाने के लिए फंड के साथ अप्रूवल भी मिल गया है। इसके बाद हम फीफ्थ जनरेशन में सशक्त हो जाएंगे। उसका जो इंजन है, उसमें हम अभी भी पीछे हैं।

सरकार को फीफ्थ जनरेशन, सिक्स जनरेशन एयरक्राफ्ट इंजन बनाने के लिए इन्वेस्ट करना पड़ेगा। इसमें 20-25 हजार करोड़ का इन्वेस्टमेंट लगेगा। हमेशा बाहर से इंजन खरीदेंगे तो कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाएंगे। यहां हमको इन्वेस्ट करना पड़ेगा। युद्धपोतों की बात करें तो कुछ दिन पहले हमने डिक्लेयर किया था कि आखिरी युद्धपोत है, जिसे हमने विदेश से खरीदा है। अब हम युद्ध पोत बनाने में सक्षम हो गए हैं। न्यूक्लियर और कन्वेंशनल सबमरीन बनाने में सक्षम हो गए हैं। अभी हमने जोरावर टैंक बनाया। स्मॉल वैपन बनाने में भी हम आत्मनिर्भर हैं।

तोप के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं। एक-डेढ़ साल में हम यूएवी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जाएंगे। ऐसा कोई क्षेत्र दिखता नहीं है, जिसमें कोई कमी है। इसमें केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों का भी बड़ा श्रेय है। राज्य सरकारें भी रुचि दिखा रही हैं, क्योंकि इससे रोजगार पैदा होता है। हमारे देश में जो युवा हैं, 65 प्रतिशत 30 साल से कम के हैं। इनमें से हर युवा नौकरी नहीं चाहता। इनमें से एक प्रतिशत भी यदि खुद का उद्योग लगाएंगे तो एक औद्योगिक क्रांति आ जाएगी।

न्यूक्लियर पॉवर को लेकर ईरान-इजराइल के बीच युद्ध और इसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं।

जवाब: सबसे बड़ा जो उद्देश्य था, वह था ईरान को न्यूक्लियर पॉवर नहीं बनने देना। यूएस ने जैसा डिक्लेयर किया है कि उन्होंने यह उद्देश्य हासिल कर लिया है। अब ईरान न्यूक्लियर पॉवर नहीं बन पाएगा तो इस क्षेत्र में शांति हो जानी चाहिए। इससे पूरे विश्व में एनर्जी सिक्योरिटी रहेगी। जहां तक भारत की बात है तो तीनों देशों से भारत की दोस्ती है।

हमारे लिए तो असमंजस की स्थिति थी। हमारे तरफ से तो यही कहा गया कि आप कूटनीतिक तरीके से हल करने का मौका दीजिए। हमें ये देखना है कि पाकिस्तान जैसा कि आपने देखा होगा कि इसको आतंकवाद के कारण ही एक फाइनेंशियल संस्था ने बैन कर दिया था।

न्यूक्लियर आर्म्स यदि टेरेरिस्ट के हाथ में पड़ गए तो पूरे विश्व में अव्यवस्था आ जाएगी। जिस तरीके से ईरान के न्यूक्लियर पॉवर बनने की कोशिशों को खत्म किया गया है, मुझे लगता है कि कुछ सालों बाद पाकिस्तान में अगर मजबूत लोकतंत्र की बहाली नहीं होती है तो पूरे विश्व को हस्तक्षेप करना पड़ेगा और पाकिस्तान को डीन्यूक्लियराइज करना पड़ेगा।

आज एआई लोगों की मुश्किलें हल कर रहा है। क्या ये मुश्किलें भी बढ़ा सकता है। इस चुनौती के लिए क्या कोशिशें हो रही हैं। जवाब: मुझे पूरा विश्वास है कि हम एआई का इस्तेमाल कर पूरी तरह कंस्ट्रक्टिव, पॉजिटिव और क्रिएटिव डायरेक्शन में आगे बढ़ेंगे। एआई के फायदे ज्यादा होंगे, नुकसान की अपेक्षा। हर चीज के लिए रूल ऑफ द गेम बनता है, वह बन रहा है एआई के लिए भी।

जब वो रूल्स बन जाएंगे तो कोई भी देश या व्यक्ति गैरकानूनी काम करेगा तो उसको रोका जाएगा। मुझे नहीं लगता कि एआई हमारे लिए नकारात्मक चुनौती है। ये हमारे लिए सकारात्मक चुनौती और हमारे जीवन को आसान करने वाली चीज है।

साइबर अटैक कितना खतरनाक हो सकता है। क्या हम इससे बचने के लिए तैयार हैं?

ब्रह्मोस के पूर्व CEO डॉ. सुधीर मिश्रा का बयान: पहले मिसाइल आयात करते थे, अब निर्यात कर रहे हैं जवाब: भारत सामरिक दृष्टि से किसी भी प्रकार के हमले के लिए चाहे वह साइबर हो, स्पेस हो या अन्य किसी भी डायरेक्शन के लिए हो, हर तरह से तैयार हैं। कई बातों की घोषणा नहीं होती है। भारत एक बड़ा राष्ट्र है। एक्सपायरिंग वर्ल्ड पॉवर है तो टेक्नोलॉजी के हर क्षेत्र में काम हो रहा है। किसी क्षेत्र को छोड़ा नहीं जा रहा है, चाहे वह साइबर हो, क्वांटम हो या स्पेस हो।

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