सीजी भास्कर, 17 सितंबर : न्याय तो छोड़िए, सिर्फ मुकदमा दर्ज कराने में कितने जतन करने पड़ते हैं, यह मामला उसकी बानगी है। जवान बेटे की हत्या (Murder Case Filing Delay) का मुकदमा कराने के लिए थाना-कचहरी के चक्कर लगाते-लगाते पिता की मौत हो गई तो भतीजे ने बीड़ा उठाया। पैरवी करते-करते सात बीघा जमीन बिक गई। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में 43 एसपी बदले, लेकिन कोई नहीं पसीजा। दाद देनी होगी परिवार की, जिला मुख्यालय के पांच सौ से ज्यादा बार चक्कर काटे। हताश हुए, लेकिन आस नहीं खोई। मामला हाई कोर्ट पहुंचा तो न्याय मिला। एसपी डॉ. दुर्गेश कुमार ने बताया कि आठ लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। इनमें से एक आरोपित की मौत हो चुकी है।
मामला उत्तर प्रदेश के कोंच कस्बे का है। 1995 में नवरात्र पर देवी प्रतिमा स्थापित हुई थी। पांच अक्टूबर, 1995 को प्रतिमा विसर्जन के लिए उमाशंकर बाजपेयी का पुत्र 22 वर्षीय प्रदीप सबके साथ सैदनगर बेतवा नदी पर गया था। शाम करीब पौने छह बजे उसके डूबने की सूचना आई। तलाश के बाद भी शव नहीं मिला। पिता ने आरोप लगाया कि उनके परिवार के ही आठ लोगों ने जमीन के लालच में बेटे की नदी में डुबाकर हत्या (Murder Case Filing Delay) कर दी। लेकिन पुलिस ने इसे हादसा मानकर जांच बंद कर दी।
पिता ने तत्कालीन एसपी से शिकायत की, लेकिन शव न मिलने से मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। हारकर पिता ने 14 अक्टूबर, 1998 को स्थानीय अदालत में अपील दायर की। उसी दिन कोटरा थाने में एफआईआर दर्ज करने का आदेश हुआ, लेकिन पुलिस ने मामले को टाल दिया। चक्कर लगाते-लगाते उमाशंकर बीमार हो गए और 27 अप्रैल, 2021 को करीब 75 वर्ष की उम्र में उनकी मौत हो गई।
मुकदमा न होने से आरोपितों के हौसले बुलंद थे और वे धमकियां देने लगे। कागजात भी गायब कर दिए गए। परेशान होकर उमाशंकर के बड़े बेटे देवेंद्र के बेटे सोनू ने दौड़भाग शुरू की और हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने 24 जून, 2025 को स्थानीय अदालत को मुकदमे को लेकर आदेश दिए। इसके बाद पुलिस ने नई पत्रावलियां तैयार कराईं।
कोटरा थानाध्यक्ष विमलेश कुमार ने बताया कि 17 सितंबर को पुरानी तहरीर के आधार पर श्रीराम, राकेश, प्रेमनारायण, प्रकाश नारायण, कुलदीप नारायण, अनिल कुमार, अनूप कुमार और श्याम नारायण के खिलाफ युवक की हत्या (Murder Case Filing Delay) और साक्ष्य छिपाने की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। एक आरोपित प्रकाश नारायण की पहले ही मौत हो चुकी है, जिसे विवेचना में हटाया जाएगा।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक थाने में मामले की शुरुआत की एंट्री ही दर्ज नहीं थी। परिवार स्थानीय अदालत के आदेश का हवाला जरूर दे रहा था, लेकिन थाने में यह जानकारी कहीं नहीं थी। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि एक साधारण नागरिक को हत्या जैसे गंभीर अपराध (Murder Case Filing Delay) का मुकदमा लिखवाने के लिए भी जिंदगी भर संघर्ष करना पड़ सकता है।





