सीजी भास्कर, 15 जनवरी। डायबिटीज अब सिर्फ ब्लड शुगर तक सीमित बीमारी नहीं रह गई है। यह धीरे-धीरे भारत के लिए एक ऐसी चुनौती बनती (Diabetes Economic Impact India) जा रही है, जिसका असर अस्पतालों से निकलकर परिवारों, कार्यस्थलों और पूरी अर्थव्यवस्था तक फैल रहा है। हालिया अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में चौंकाने वाला अनुमान सामने आया है कि मधुमेह के कारण भारत को भविष्य में करीब 11.4 लाख करोड़ डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।
इस मामले में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है। पहले नंबर पर अमेरिका और तीसरे पर चीन है। यह आंकड़ा साफ संकेत देता है कि भारत में डायबिटीज अब स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक जोखिम बन चुकी है।
भारत में 21 करोड़ से ज्यादा मरीज, इलाज से दूर बड़ी आबादी
वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो भारत में करीब 21.2 करोड़ लोग मधुमेह (Diabetes Economic Impact India) से पीड़ित हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग 62 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं, जिन्हें समय पर इलाज या सही चिकित्सकीय देखभाल नहीं मिल पा रही है।
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शहरी क्षेत्रों में जीवनशैली से जुड़ी गलत आदतें और जागरूकता की कमी इस स्थिति को और गंभीर बना रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इलाज में देरी डायबिटीज को दिल, किडनी, आंखों और नर्व से जुड़ी बीमारियों में बदल देती है, जिससे इलाज और महंगा हो जाता है।
वैश्विक तस्वीर क्या कहती है
दुनिया भर में इस समय करीब 83 करोड़ वयस्क मधुमेह से जूझ (Diabetes Economic Impact India) रहे हैं। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह संख्या 130 करोड़ के पार पहुंच सकती है। यानी आने वाले समय में हर दस में से एक वयस्क डायबिटीज का मरीज होगा।
डायबिटीज कैसे बन रही है आर्थिक बोझ
मधुमेह ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर या तो पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या बना हुआ इंसुलिन ठीक से काम नहीं करता। इसका सीधा असर रक्त में शुगर लेवल पर पड़ता है। यह बीमारी अनुवांशिक हो सकती है, लेकिन आज के समय में खराब खानपान, मोटापा, तनाव, नींद की कमी और शारीरिक निष्क्रियता इसके सबसे बड़े कारण बन चुके हैं।
अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि डायबिटीज से होने वाला नुकसान सिर्फ दवाओं और इलाज के खर्च तक सीमित नहीं है।
इसमें शामिल हैं—
काम करने की क्षमता में गिरावट
नौकरी से छुट्टियां और उत्पादकता का नुकसान
परिवार के सदस्यों द्वारा दी जाने वाली बिना भुगतान वाली देखभाल
असली नुकसान का आंकड़ा
वैश्विक स्तर पर डायबिटीज से होने वाला कुल आर्थिक नुकसान करीब 10.2 लाख करोड़ डॉलर आंका गया है।
अगर मरीजों की देखभाल में परिवार द्वारा दिए गए समय और मेहनत की आर्थिक कीमत भी जोड़ी जाए, तो यह आंकड़ा बढ़कर 152 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाता है।
क्यों भारत पर ज्यादा भारी पड़ रही है बीमारी
भारत में डायबिटीज का बोझ इसलिए ज्यादा महसूस (Diabetes Economic Impact India) हो रहा है क्योंकि मरीजों की संख्या बहुत अधिक है और स्वास्थ्य सुविधाओं तक समान पहुंच नहीं है। मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों में इलाज का खर्च सीधे घरेलू बजट पर असर डालता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक दृष्टि से डायबिटीज अब कैंसर और अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारियों से भी ज्यादा महंगी साबित हो रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह बीमारी धीरे-धीरे नुकसान करती है, इसलिए खतरा समय पर नजर नहीं आता।
क्या है आगे का रास्ता
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते रोकथाम, जीवनशैली में बदलाव, नियमित जांच और सुलभ इलाज को लेकर ठोस रणनीति नहीं बनाई गई, तो आने वाले वर्षों में डायबिटीज भारत की विकास गति पर सीधा असर डाल सकती है। डायबिटीज से लड़ाई सिर्फ अस्पतालों में नहीं, बल्कि घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों से शुरू करनी होगी—तभी इस बढ़ते खतरे को रोका जा सकेगा।


