सीजी भास्कर, 16 जनवरी। छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी के इंजीनियरों एवं तकनीकी कर्मचारियों ने अपने अनुभव, तकनीकी समझ और नवाचार के दम पर लगभग 60 वर्ष पुरानी जर्मन निर्मित रेडियल ड्रिल मशीन को दोबारा जीवंत कर दिखाया है। यह मशीन वर्ष 1965 में जर्मनी से आयात की गई थी और लंबे समय से तकनीकी खराबी के कारण अनुपयोगी स्थिति में पड़ी हुई थी। अब (German Radial Drill Machine) को पुनः कार्यशील बनाकर बिजलीकर्मियों ने न सिर्फ विभागीय आत्मनिर्भरता का उदाहरण प्रस्तुत किया है, बल्कि आधुनिक तकनीकी युग में पुराने संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग की दिशा में भी एक नई मिसाल कायम की है।
राज्य गठन के कुछ वर्षों बाद यह जर्मन रेडियल ड्रिल मशीन तकनीकी कारणों से बंद हो गई थी। समय के साथ इसके स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी विशेषज्ञता मिलना भी लगभग असंभव हो गया था। प्रारंभिक चरण में बाहरी विशेषज्ञों और संबंधित कंपनियों से संपर्क किया गया, किंतु अत्यधिक पुरानी तकनीक होने के कारण मरम्मत की संभावना से सभी ने हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी के अनुभवी इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों ने स्वयं पहल करते हुए (German Radial Drill Machine) के प्रत्येक यांत्रिक और विद्युत घटक का गहन परीक्षण शुरू किया।
कर्मियों ने मशीन को पूरी तरह खोलकर उसके सिस्टम को समझा, खराब हिस्सों की पहचान की और चरणबद्ध तरीके से सुधार कार्य को आगे बढ़ाया। यह प्रक्रिया आसान नहीं थी, क्योंकि 60 साल पुरानी यूरोपियन ग्रेड तकनीक को वर्तमान परिस्थितियों में दोबारा चालू करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी। बावजूद इसके, टीम ने धैर्य, निरंतर प्रयास और तकनीकी दक्षता के बल पर अंततः (German Radial Drill Machine) को पूर्ण रूप से कार्यशील बना दिया।
इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी के अध्यक्ष सुबोध कुमार सिंह एवं प्रबंध निदेशक राजेश कुमार शुक्ला ने बिजलीकर्मियों की खुले दिल से सराहना की। उन्होंने कहा कि यह सफलता विभागीय दक्षता, आत्मनिर्भर सोच और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का प्रतीक है। प्रबंध निदेशक ने यह भी कहा कि आउटसोर्सिंग के बढ़ते चलन के बीच इनहाउस टैलेंट पर भरोसा करना भविष्य के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है और (German Radial Drill Machine) का पुनर्जीवन उसी सोच का परिणाम है।
कार्यपालक निदेशक (ट्रांसमिशन) वीके दीक्षित ने बताया कि इस रेडियल ड्रिल मशीन के पुनः चालू होने से अति उच्च दाब ट्रांसमिशन टावरों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले मोटे स्टील एंगल, प्लेट और भारी संरचनात्मक सामग्री में तेज़ और सटीक ड्रिलिंग संभव हो सकेगी। इससे जहां कार्य की गति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी, वहीं कम कर्मचारियों में ही काम पूरा हो पाएगा, जिससे मानव संसाधन की उत्पादकता और दक्षता दोनों में वृद्धि सुनिश्चित होगी।
अधीक्षण अभियंता केके यादव ने बताया कि यह मशीन जर्मनी की प्रसिद्ध हेवी इंडस्ट्रियल कंपनी द्वारा विशेष रूप से ट्रांसमिशन टावरों के लिए डिजाइन की गई थी। यह साधारण ड्रिल मशीन नहीं, बल्कि एक यूरोपियन ग्रेड हेवी इंडस्ट्रियल सिस्टम है, जिसमें 60 मिमी तक मोटे स्टील की कटिंग, पंचिंग और नाचिंग एक साथ संभव है। लगभग 20 वर्षों से भिलाई-03 वर्कशॉप में बंद पड़ी (German Radial Drill Machine) के स्पेयर पार्ट्स अब बाजार में उपलब्ध नहीं थे, जिसके कारण निर्माता कंपनी ने भी इसमें रुचि नहीं दिखाई।
श्री यादव ने बताया कि कार्यपालन अभियंता बरखा दुबे, सहायक अभियंता आकाश सिन्हा, तकनीकी कर्मचारी शाहजहां शाह, टी. सिम्हाचलम् सहित पूरी टीम ने मिलकर इस मशीन को फिर से जीवन दिया। इस जटिल कार्य में करीब दो वर्षों का समय लगा। मशीन की विशेषता यह है कि यह 16 मिमी मोटाई के लोहे के एंगल में दो दिशाओं में एक साथ ड्रिलिंग कर सकती है और 180 डिग्री घूमकर काम करती है। पहले यह कार्य बाहरी एजेंसियों से कराया जाता था, जिसमें अधिक समय और खर्च लगता था, लेकिन अब (German Radial Drill Machine) के चालू होने से लागत और समय दोनों की बचत होगी।


