सीजी भास्कर 16 जनवरी UPI Transaction Charge Debate: भारत में डिजिटल भुगतान की तस्वीर बदल चुकी है। कभी जेब में छुट्टे ढूंढने वाला देश आज QR स्कैन से सेकंडों में भुगतान कर रहा है। लेकिन अब इसी सिस्टम को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या UPI हमेशा मुफ्त रह पाएगा? हाल के महीनों में फिनटेक सेक्टर से उठती आवाज़ें बता रही हैं कि मौजूदा मॉडल पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
UPI Transaction Charge Debate और कंपनियों की चिंता
UPI भले ही यूजर्स के लिए आसान हो, लेकिन इसे चलाने की कीमत बहुत भारी है। टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म, हाई-लेवल सर्वर, 24×7 साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड मॉनिटरिंग और कस्टमर सपोर्ट—ये सब मिलकर हजारों करोड़ रुपये की लागत खड़ी करते हैं। कंपनियों का कहना है कि सिर्फ ट्रैफिक बढ़ने से सिस्टम नहीं चलता, उसके लिए फंडिंग भी जरूरी है।
सरकारी इंसेंटिव में गिरावट और असर
पिछले कुछ वर्षों में सरकार की ओर से डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए इंसेंटिव दिया गया। लेकिन अब यह सहायता धीरे-धीरे घटती जा रही है। जहां पहले यह राशि हजारों करोड़ में थी, वहीं मौजूदा बजटीय प्रावधान काफी सीमित हो चुके हैं। यही वजह है कि कंपनियां अब (Sustainable Digital Payment Model) की बात करने लगी हैं।
UPI Transaction Charge Debate पर लागत का सवाल
डिजिटल भुगतान दिखने में भले ही “फ्री” लगे, लेकिन इसकी एक कीमत है। हर ट्रांजैक्शन के पीछे डेटा प्रोसेसिंग, नेटवर्क स्टेबिलिटी और सिक्योरिटी लेयर काम करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर इस लागत का समाधान नहीं निकला, तो भविष्य में सेवा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
रिकॉर्ड ट्रांजैक्शन, लेकिन बढ़ता दबाव
UPI का इस्तेमाल आज रिकॉर्ड स्तर पर है। महीने-दर-महीने ट्रांजैक्शन और वैल्यू नए कीर्तिमान बना रहे हैं। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक इसका विस्तार हो चुका है। दिलचस्प बात यह है कि जितना ज्यादा इस्तेमाल बढ़ रहा है, उतना ही ज्यादा खर्च भी बढ़ता जा रहा है—यही असंतुलन चिंता की जड़ है।
फिनटेक कंपनियों की MDR की मांग
इसी बीच फिनटेक कंपनियों ने सरकार के सामने एक सुझाव रखा है। उनका कहना है कि आम यूजर और छोटे दुकानदारों के लिए UPI फ्री रहे, लेकिन बड़े मर्चेंट्स से मामूली Merchant Discount Rate यानी (MDR on UPI Payments) लिया जाए। प्रस्तावित दर 0.25% से 0.30% के बीच बताई जा रही है।
UPI Transaction Charge Debate और आम लोगों पर असर
कंपनियों का तर्क साफ है—अगर MDR सिर्फ बड़े कारोबारियों पर लागू होता है, तो आम जनता पर कोई सीधा बोझ नहीं पड़ेगा। उल्टा, इससे सिस्टम को चलाने के लिए जरूरी संसाधन मिलेंगे और डिजिटल पेमेंट का ढांचा मजबूत बना रहेगा।
भविष्य का सवाल: मुफ्त या टिकाऊ UPI?
अब बहस इस मोड़ पर आ चुकी है कि क्या UPI को पूरी तरह मुफ्त रखना ज्यादा जरूरी है, या फिर उसे लंबे समय तक टिकाऊ बनाना। आने वाले समय में नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती यही होगी कि सुविधा और स्थिरता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।


