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Illegal Police Action Case : होटल में घुसपैठ, बिना FIR गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट सख्त, पुलिस पर ₹1 लाख का जुर्माना

By Newsdesk Admin
23/01/2026
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सीजी भास्कर, 23 जनवरी | दुर्ग जिले के एक निजी होटल में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई को हाईकोर्ट ने गंभीर कानून उल्लंघन माना है। गुमशुदा युवती की तलाश के नाम पर पुलिसकर्मी होटल परिसर में घुसे, मैनेजर से बदसलूकी की और वैध दस्तावेज़ों के साथ ठहरे लोगों को कमरों से बाहर निकाल दिया। यह पूरा मामला अब (Illegal Police Action Case) के रूप में न्यायिक जांच के केंद्र में आ गया है।

Contents
  • मालिक से मारपीट, फिर जेल
  • आजीविका के अधिकार की बात
  • कमरे में जबरन प्रवेश
  • सरकारी काम में बाधा का दावा
  • बिना FIR जेल असंवैधानिक
  • Illegal Police Action Case में एसडीएम की भूमिका पर सवाल
  • जुर्माना और वसूली का आदेश
  • भरोसे की नींव हिलती है

मालिक से मारपीट, फिर जेल

होटल संचालक का आरोप है कि पुलिस ने विरोध करने पर न सिर्फ उनके साथ मारपीट की, बल्कि बिना किसी प्राथमिकी दर्ज किए उन्हें हिरासत में लेकर जेल भेज दिया। पीड़ित के मुताबिक, होटल में ठहरे सभी लोगों ने आधार कार्ड जैसे वैध पहचान पत्र जमा किए थे, इसके बावजूद पुलिस ने नियमों की अनदेखी की।

आजीविका के अधिकार की बात

होटल संचालक आकाश कुमार साहू ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर गिरफ्तारी को अवैध बताया। उन्होंने कहा कि होटल विधिवत लाइसेंस प्राप्त है और यही उनकी आय का एकमात्र स्रोत है। बिना वैधानिक प्रक्रिया के गिरफ्तारी करना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, जो (Right to Livelihood) से जुड़ा विषय है।

कमरे में जबरन प्रवेश

याचिका में बताया गया कि घटना के दिन पुलिसकर्मी बिना महिला बल के एक कमरे में घुस गए, जहां पुरुष और महिला ठहरे थे। उन्हें बाहर निकाला गया और कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। बाद में कथित चोरी का आरोप लगाकर दोबारा होटल पहुंचकर तलाशी ली गई, जबकि सीसीटीवी जांच की बात को नजरअंदाज किया गया।

सरकारी काम में बाधा का दावा

पुलिस अधिकारियों ने अदालत में कहा कि कार्रवाई गुमशुदा लड़की की तलाश में की गई थी। उनका दावा था कि होटल संचालक ने सरकारी कार्य में बाधा डाली, जिससे शांति भंग होने की स्थिति बनी। इसी आधार पर बीएनएस की धारा 170 के तहत हिरासत में लेने की बात कही गई।

बिना FIR जेल असंवैधानिक

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज नहीं थी। केवल संदेह और बहस के आधार पर जेल भेजना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के समय कारण लिखित में बताना अनिवार्य होता है, जो इस मामले में नहीं किया गया।

Illegal Police Action Case में एसडीएम की भूमिका पर सवाल

हाईकोर्ट ने पुलिस के साथ-साथ एसडीएम की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक विवेक का प्रयोग करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने पुलिस रिपोर्ट पर यांत्रिक रूप से मुहर लगाकर युवक को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

जुर्माना और वसूली का आदेश

अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया। राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर ₹1 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया गया है। साथ ही यह छूट दी गई है कि जांच के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से यह राशि वसूल की जा सकती है। देरी होने पर 9% वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

भरोसे की नींव हिलती है

डिवीजन बेंच ने कहा कि अवैध गिरफ्तारी, पुलिस अत्याचार और गैरकानूनी रिमांड से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा कमजोर होता है। कानून लागू करने वाली संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब वे मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करें।

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