सीजी भास्कर 27 जनवरी। दिल्ली हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी को बड़ी राहत देते हुए CBI द्वारा जारी नोटिस को रद्द कर (Delhi High Court Verdict) दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 का इस्तेमाल आरोपी या गवाह से उसकी निजी जानकारियां जबरदस्ती हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 91 CrPC का उद्देश्य केवल पहले से मौजूद दस्तावेजों या वस्तुओं को जांच के लिए पेश करवाना है, न कि किसी व्यक्ति को अपनी याददाश्त के आधार पर जानकारी लिखकर देने के लिए बाध्य करना। मोबाइल नंबर, बैंक खाते का विवरण, स्टाफ की जानकारी या अन्य व्यक्तिगत डेटा इस धारा के दायरे में नहीं आते।
कोर्ट की बेंच ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को इस तरह की जानकारी देने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन होगा। अनुच्छेद 20(3) के तहत किसी भी व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, चाहे वह आरोपी हो या जांच के दायरे में आया कोई व्यक्ति।
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों के पास जानकारी जुटाने के अन्य वैधानिक विकल्प (Delhi High Court Verdict) मौजूद हैं। जैसे धारा 161 CrPC के तहत पूछताछ, जिसमें व्यक्ति को चुप रहने का अधिकार प्राप्त है, या फिर बैंकों, टेलीकॉम कंपनियों और अन्य संबंधित संस्थानों से सीधे रिकॉर्ड मंगवाना। अदालत ने कहा कि जांच की सुविधा के नाम पर संवैधानिक सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 91 का प्रयोग केवल मौजूदा दस्तावेजों या वस्तुओं तक सीमित है। इसे इस तरह नहीं बढ़ाया जा सकता कि आरोपी को खुद के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने के लिए मजबूर किया जाए।
यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी से जुड़ा है। भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले की जांच के दौरान CBI ने उन्हें नोटिस जारी कर उनके मोबाइल नंबर, बैंक खातों के स्टेटमेंट, ड्राइवर और घरेलू सहायकों से संबंधित जानकारियां (Delhi High Court Verdict) मांगी थीं। जस्टिस कुद्दूसी ने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए ट्रायल कोर्ट में चुनौती दी थी।
ट्रायल कोर्ट ने CBI के नोटिस को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ CBI ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए साफ कर दिया कि जांच एजेंसियां कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्रवाई कर सकती हैं। इस फैसले को जांच एजेंसियों की शक्तियों और नागरिक अधिकारों के संतुलन के लिहाज से एक अहम नजीर माना जा रहा है।


