सीजी भास्कर, 31 जनवरी | Chhattisgarh High Court Divorce Ruling : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक अहम मामले में साफ कहा है कि पति-पत्नी का अलग-अलग रहना अपने-आप में तलाक का आधार नहीं बनता। अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक के लिए क्रूरता और परित्याग के ठोस व प्रमाणिक साक्ष्य आवश्यक होते हैं।
डिवीजन बेंच ने सुनाया फैसला
जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए पति की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि निचली अदालत द्वारा दिया गया निर्णय विधि और साक्ष्यों के अनुरूप है।
35 साल पुराने विवाह से जुड़ा मामला
यह मामला लगभग 35 वर्ष पुराने वैवाहिक संबंध से जुड़ा था। पति ने यह तर्क दिया कि उनकी पत्नी पिछले 14–15 वर्षों से उनसे अलग रह रही है, लेकिन अदालत ने कहा कि केवल अलग रहना परित्याग (Desertion) नहीं माना जा सकता।
पति ने क्या लगाए थे आरोप
पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया कि पत्नी झगड़ा करती थी और मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थी। पेशे से पुजारी पति ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग की थी।
पत्नी ने क्यों रखा विरोध
पत्नी ने अदालत में कहा कि पति गाली-गलौच, मारपीट और चरित्र पर संदेह करता था। उन्होंने यह भी बताया कि वह ब्लड प्रेशर और शुगर जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं और इलाज का खर्च पति ने कभी नहीं उठाया, जिस कारण उन्हें बेटी के घर रहना पड़ा।
फैमिली कोर्ट का पूर्व फैसला
बेमेतरा फैमिली कोर्ट ने 5 जुलाई 2023 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने माना कि पत्नी द्वारा जानबूझकर दो वर्ष या उससे अधिक समय तक परित्याग का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि क्रूरता साबित करने के लिए सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए ठोस घटनाएं, स्पष्ट आरोप और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं। पति के गवाहों के बयान भी सामान्य प्रकृति के पाए गए।
काउंसलिंग रिपोर्ट बनी अहम आधार
महिला प्रकोष्ठ की काउंसलिंग रिपोर्ट में पत्नी के कथन अधिक विश्वसनीय पाए गए। कोर्ट ने माना कि प्रस्तुत रिकॉर्ड फैमिली कोर्ट के निर्णय के विपरीत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला
डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि तलाक जैसे गंभीर मामलों में अनुमान या अस्पष्ट आरोपों पर फैसला नहीं दिया जा सकता। इसी आधार पर पति की अपील को खारिज कर दिया गया।




