सीजी भास्कर। 1 फरवरी Budget 2026 Poor Impact : केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए आम बजट 2026 पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बजट को सीधे तौर पर गरीब-विरोधी बताते हुए कहा कि इसमें आम जनता की बुनियादी समस्याओं को नजरअंदाज किया गया है।
महंगाई पर चुप्पी, रोडमैप नदारद
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि देश की सबसे बड़ी चुनौती महंगाई है, लेकिन बजट में इसे काबू में करने के लिए कोई ठोस योजना नहीं दिखाई देती। उनके मुताबिक, यह बजट जितने सवालों के जवाब देने का दावा करता है, उससे कहीं ज्यादा सवाल खड़े करता है।
‘सरकार के पास नए विचार नहीं’
खरगे ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार के पास अब देश की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से निपटने के लिए कोई नया विजन नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि बजट में न तो सकारात्मक सुझाव हैं और न ही ऐसे कदम, जो भविष्य की चुनौतियों का समाधान कर सकें।
व्यापार अनिश्चितता और कमजोर रुपया अनदेखा
कांग्रेस अध्यक्ष ने आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता और रुपये के गिरते मूल्य को लेकर सरकार ने कोई रणनीति पेश नहीं की। उपभोक्ता मांग को दोबारा खड़ा करने के लिए भी बजट में कोई इरादा नजर नहीं आता।
बेरोजगारी और निजी कर्ज पर चुप्पी
खरगे ने कहा कि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, वहीं घरेलू बचत में गिरावट और व्यक्तिगत कर्ज का बोझ भी गंभीर चिंता का विषय है। बावजूद इसके, बजट में इन मुद्दों पर कोई समाधान नहीं दिखता।
राज्यों के लिए राहत का अभाव
उन्होंने कहा कि गंभीर वित्तीय दबाव झेल रही राज्य सरकारों के लिए बजट में कोई बड़ा ऐलान नहीं किया गया है। वित्त आयोग की सिफारिशों पर भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया, जिससे राज्यों की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।
सामाजिक असमानता पर चुप्पी
कांग्रेस अध्यक्ष का कहना है कि देश में असमानता ऐतिहासिक स्तर को पार कर चुकी है, लेकिन बजट में इसका उल्लेख तक नहीं है। अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और अल्पसंख्यकों के लिए किसी नई सहायता का प्रावधान नहीं किया गया।
शिक्षा और स्कॉलरशिप पर सवाल
खरगे ने आरोप लगाया कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में पिछले साल का पूरा बजट भी खर्च नहीं किया गया। इस बार शिक्षा का बजट और घटा दिया गया, जबकि स्कूलों और छात्रवृत्ति का बजट में जिक्र तक नहीं हुआ।
‘नारा और हकीकत में फर्क’
उन्होंने कहा कि सरकार का नारा ‘सबका साथ, सबका विकास’ कागजों तक सीमित रह गया है। बजट के आंकड़े बताते हैं कि सामाजिक सुरक्षा, कल्याण और रोजगार जैसे मुद्दे प्राथमिकता में नहीं हैं। खरगे ने इसे थकी हुई सोच का बजट करार दिया।




