सीजी भास्कर, 07 फरवरी | एक ऐसा दृश्य, जहां शब्द कम और भावनाएं अधिक थीं। मंच पर औपचारिक भाषणों से पहले जो कुछ घटा, उसने आयोजन को खास बना दिया। लोक परंपराओं की आत्मा, मिट्टी की सौंधी गंध और संस्कृति का मौन संवाद—यही इस पल की पहचान बना।
दूसरे ही क्षण यह स्पष्ट हुआ कि यह अवसर छत्तीसगढ़ के जगदलपुर (President Droupadi Murmu) में था, जहां लालबाग मैदान एक विराट सांस्कृतिक रंगमंच में बदल गया। यहां द्रौपदी मुर्मू ने बस्तर पंडुम के संभाग स्तरीय आयोजन का विधिवत शुभारंभ किया। कार्यक्रम में विष्णु देव साय ने राष्ट्रपति को बस्तर की पहचान माने जाने वाले ढोकरा शिल्प से निर्मित कर्मा वृक्ष और कोसा शिल्प से तैयार पारंपरिक गमछा भेंट किया।
कार्यक्रम की शुरुआत से पहले राष्ट्रपति ने प्रदर्शनी स्टॉलों का गहन अवलोकन (President Droupadi Murmu) किया। यहां आदिवासी कारीगरों की कलात्मकता, लोक शिल्प की बारीकियां और पीढ़ियों से चली आ रही तकनीकों ने सभी का ध्यान खींचा। राष्ट्रपति ने विभिन्न जनजातियों के जीवन, उनकी परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को बेहद नजदीक से देखा और सराहा।
बस्तर पंडुम के मंच पर आदिवासी समाज की जीवंतता पूरी भव्यता के साथ सामने आई। पारंपरिक नृत्य, लोकगीतों की लय, विशिष्ट वाद्ययंत्रों की गूंज, रंग-बिरंगी वेशभूषा और अनूठे रीति-रिवाजों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बस्तर की आत्मा से जोड़ दिया। यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव का सार्वजनिक उत्सव बन गया।
इस अवसर ने यह संदेश भी दिया कि आधुनिकता की दौड़ में भी परंपराएं अपनी जड़ों के साथ मजबूती (President Droupadi Murmu) से खड़ी हैं। बस्तर पंडुम ने एक बार फिर साबित किया कि संस्कृति जब मंच पर उतरती है, तो वह केवल देखी नहीं जाती -महसूस की जाती है।




