सीजी भास्कर, 07 फरवरी | Bastar Pandum Inauguration : जगदलपुर में आयोजित तीन दिवसीय आदिवासी सांस्कृतिक महाकुंभ बस्तर पंडुम का औपचारिक शुभारंभ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। उद्घाटन समारोह में पारंपरिक नृत्य, वेशभूषा और लोक-संस्कृति की झलक के बीच राष्ट्रपति ने बस्तर को लेकर एक भावनात्मक संदेश दिया।
चार दशकों के संघर्ष के बाद बदला माहौल
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि लगभग चार दशकों तक बस्तर माओवादी हिंसा से प्रभावित रहा, जिसका सबसे अधिक नुकसान आदिवासी समाज और युवाओं को झेलना पड़ा। उन्होंने कहा कि निर्णायक प्रयासों के चलते अब वह वातावरण खत्म हो चुका है, जहां भय और अविश्वास हावी था, और बस्तर में शांति की वापसी हो रही है।
हिंसा छोड़ मुख्यधारा में लौट रहे लोग
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि बड़ी संख्या में माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर रहे हैं। सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि हथियार छोड़ने वाले लोग सम्मानजनक और सामान्य जीवन जी सकें। उनके पुनर्वास, शिक्षा और आजीविका के लिए विशेष योजनाएं लागू की जा रही हैं।
गांवों तक पहुंची सड़क, स्कूल और बिजली
राष्ट्रपति ने कहा कि आज बस्तर के गांव-गांव में सड़क, बिजली और पेयजल की सुविधाएं पहुंच रही हैं। वर्षों से बंद पड़े स्कूल फिर से खुल चुके हैं और बच्चे पढ़ाई की ओर लौट रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ बस्तर के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए आशा का संकेत है।
लोकतंत्र की ताकत का उदाहरण
राष्ट्रपति मुर्मू ने लोकतंत्र की ताकत को रेखांकित करते हुए कहा कि एक साधारण आदिवासी परिवार से आने वाली बेटी आज देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर है। उन्होंने बस्तर के लोगों से संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास बनाए रखने की अपील की।
बस्तर की पहचान और आत्मा
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि बस्तर पंडुम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा है। यह मंच आदिवासी कलाकारों की प्रतिभा को पहचान देता है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष इस आयोजन में हजारों कलाकारों की भागीदारी रही थी और इस वर्ष इससे भी अधिक पंजीकरण हुए हैं।
गोलियों से मंच तक का सफर
मुख्यमंत्री ने कहा कि एक समय था जब बस्तर में गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, आज वहां स्कूल की घंटियां बज रही हैं। जहां कभी तिरंगा नहीं फहराया जाता था, वहां अब राष्ट्रगान गूंजता है। बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक इस बदलाव के प्रतीक हैं।




