राज्य के नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों में एल्डरमैन के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। (Urban Local Bodies Alderman Delay) के चलते कई निकायों में नामित जनप्रतिनिधियों की भूमिका फिलहाल शून्य है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जहां निर्वाचित पार्षदों का बहुमत पहले से मौजूद है, वहां मनोनयन की जरूरत को प्राथमिकता नहीं मिल पा रही।
नियुक्ति हुई तो बढ़ेगा सालाना खर्च
एल्डरमैन की नियुक्ति होने पर सरकार पर नियमित मानदेय के साथ-साथ वार्ड-स्तरीय विकास मद का अतिरिक्त बोझ आएगा। (Alderman Appointment Policy) के मुताबिक मानदेय का वार्षिक भार लाखों में बैठेगा, वहीं विकास कार्यों के लिए करोड़ों की राशि अलग से देनी होगी। मौजूदा व्यवस्था में निर्वाचित पार्षदों को पहले से निधि मिलने के कारण डबल फंडिंग का सवाल उठ रहा है।
क़ानूनी प्रावधान मौजूद, अमल रुका
नगर निकाय क़ानून में एल्डरमैन मनोनीत करने का प्रावधान है। (Municipal Governance Reform) के तहत कैबिनेट की मंजूरी के बाद नगरीय प्रशासन विभाग आदेश जारी करता है। उद्देश्य यह रहता है कि इंजीनियरिंग, स्वच्छता, वित्त और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों के अनुभवी लोग बोर्ड को तकनीकी सलाह दे सकें—लेकिन ज़मीन पर यह भूमिका फिलहाल खाली है।
बहुमत होने से प्राथमिकता बदली
कई बड़े शहरों में निर्वाचित पार्षदों का स्पष्ट बहुमत है। (Local Body Politics) के जानकार मानते हैं कि जब फैसले लेने के लिए संख्या बल पर्याप्त हो, तब नामित सदस्यों को जोड़ने की राजनीतिक तात्कालिकता कम हो जाती है। इसी वजह से फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रहीं—हालांकि औपचारिक तौर पर कोई रोक नहीं है।
विशेषज्ञों की चेतावनी, संतुलन जरूरी
शहरी वित्त पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि नियुक्ति से पहले खर्च और परिणाम का आकलन जरूरी है। (Urban Finance Impact) के तहत अगर अतिरिक्त फंडिंग आती है, तो पारदर्शी उपयोग, भूमिका की स्पष्टता और प्रदर्शन आधारित जवाबदेही तय करनी होगी—ताकि निकायों को वास्तविक लाभ मिले, केवल खर्च न बढ़े।




