(Watermelon Farming Model) अपनाते हुए युवा किसान ने फसल-चयन में साहसिक बदलाव किया—पारंपरिक धान के बजाय सब्ज़ियों और तरबूज पर फोकस किया, फील्ड लेआउट बदला, और पानी-खाद को लक्ष्यित तरीके से पहुँचाने की रणनीति अपनाई। इससे उत्पादन स्थिर हुआ, लागत नियंत्रित रही और मार्केटिंग में लचीलापन मिला।
एक एकड़ के प्रयोग से बहुफसली विस्तार तक
(Watermelon Farming Model) की शुरुआत एक एकड़ के ट्रायल से हुई—ग्राफ्टेड बैंगन ने आत्मविश्वास दिया। अगले सीज़न में अदरक, बैंगन, मिर्च और खीरे का संयोजन किया गया, जिससे नकदी प्रवाह बढ़ा और जोखिम बंटा। तीन वर्षों में यही मॉडल आय को कई गुना बढ़ाने का आधार बना।
(Watermelon Farming Model) के तहत ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग ने जड़ों तक पोषण पहुँचाया—नमी बनी रही, खरपतवार घटे, और फल-आकार व स्वाद में सुधार दिखा। मिर्च की भारी तुड़ाई और खीरे की निरंतर सप्लाई ने सीज़नल कैश-फ्लो को मजबूत किया।
सामान्य मिट्टी में तरबूज का सफल प्रयोग
(Watermelon Farming Model) का सबसे दिलचस्प पहलू—रेतीली जमीन के बिना भी तरबूज की बेहतर पैदावार। पौध-घनत्व, कतार-दूरी और पोषक घोल की समय-सारिणी से सामान्य मिट्टी में उत्पादन स्थिर रहा; अनुमानित आउटपुट ने इस प्रयोग को व्यावसायिक रूप से टिकाऊ साबित किया।
जल-सुरक्षा और मत्स्य से ड्युअल इनकम
(Watermelon Farming Model) में खेत-तालाब और भू-जल स्तर के प्रबंधन से सालभर सिंचाई संभव हुई। तालाब में मत्स्य पालन जोड़कर सहायक आय बनी—इससे जोखिम कम हुआ और निवेश-चक्र संतुलित रहा।
रोज़गार, सप्लाई-चेन और आगे की राह
(Watermelon Farming Model) ने खेत पर रोज़गार बढ़ाया, वहीं व्यापारी सीधे खेत से उठान करने लगे—लॉजिस्टिक्स सरल हुआ, कीमत बेहतर मिली। आगे पॉलीहाउस विस्तार, ग्रेडिंग-पैकिंग यूनिट और कॉन्ट्रैक्ट सप्लाई जैसे कदमों से वैल्यू-एडिशन की तैयारी है।





