सीजी भास्कर, 18 फरवरी। महासमुंद जिले के सरायपाली क्षेत्र में स्थित शिशुपाल पर्वत इन दिनों रोमांच प्रेमियों और प्रकृति के दीवानों के बीच तेजी से लोकप्रिय (Shishupal Parvat Saraipali) हो रहा है। रायपुर से लगभग 157 किलोमीटर और सरायपाली से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थान अब छत्तीसगढ़ के उभरते एडवेंचर डेस्टिनेशन के रूप में पहचान बना रहा है। हरियाली से घिरा यह पर्वत ट्रैकिंग, फोटोग्राफी और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा अनुभव प्रदान करता है।
ट्रैकिंग के साथ झरने का अद्भुत नजारा
समुद्र तल से करीब 900 फीट ऊंचाई पर स्थित शिशुपाल पर्वत तक पहुंचने के लिए जंगलों और प्राकृतिक पगडंडियों से होकर गुजरना पड़ता है। यह रास्ता ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए किसी रोमांच से कम नहीं। चट्टानी सतह, हल्की चढ़ाई और बीच-बीच में खुलते खूबसूरत दृश्य यात्रियों को आकर्षित करते हैं।
पर्वत के शीर्ष पर एक विशाल समतल मैदान है, जहां से वर्षा ऋतु में लगभग 1100 फीट नीचे गिरता जल एक भव्य जलप्रपात का रूप (Shishupal Parvat Saraipali) ले लेता है। मानसून के समय यहां का दृश्य बेहद मनोहारी हो जाता है। गिरते पानी की आवाज, आसपास फैली हरियाली और खुला आकाश इस जगह को खास बनाते हैं।
शांति, सुकून और फोटोग्राफी का केंद्र
शिशुपाल पर्वत सिर्फ एडवेंचर स्पॉट ही नहीं, बल्कि मानसिक सुकून की तलाश में आने वालों के लिए भी आदर्श स्थल है। सुबह के समय धुंध से ढका पहाड़ और शाम को ढलते सूरज की किरणें यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को और निखार देती हैं। फोटोग्राफी प्रेमियों के लिए यह स्थान किसी प्राकृतिक स्टूडियो जैसा है।
पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए यहां बुनियादी सुविधाओं के विकास की पहल भी की जा रही है, जिससे आने वाले समय में यह राज्य के प्रमुख ईको-टूरिज्म स्थलों में शामिल हो सकता है।
इतिहास और लोककथाओं से जुड़ी पहचान
स्थानीय लोगों के बीच शिशुपाल पर्वत को ‘बड़ा डोंगर’ के नाम से भी जाना जाता है। लोककथाओं के अनुसार यहां कभी राजा शिशुपाल का महल हुआ करता था। पर्वत पर जर्जर किले के अवशेष, प्राचीन मंदिर और पुराने तालाब आज भी इतिहास की झलक दिखाते हैं।
किंवदंती है कि विदेशी शासन के दौरान राजा को घेर लिया गया था, तब उन्होंने वीरता दिखाते हुए अपने घोड़े के साथ पहाड़ी से छलांग लगा दी। इसी घटना के बाद इस स्थान और यहां के झरने का नाम शिशुपाल से जुड़ गया।
आस्था और मेले से बढ़ती रौनक
मकर संक्रांति और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में लगने वाला मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र बन जाता है। इस दौरान स्थानीय व्यापारियों और कारीगरों को रोजगार के अवसर मिलते हैं।
आसपास के क्षेत्रों में बांस से बनी हस्तशिल्प वस्तुएं भी तैयार (Shishupal Parvat Saraipali) की जाती हैं, जिन्हें पर्यटन से जोड़कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
पर्यटन परिपथ की दिशा में पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि शिशुपाल पर्वत को क्षेत्र के अन्य धार्मिक और प्राकृतिक स्थलों से जोड़कर एक पर्यटन परिपथ विकसित किया जा सकता है। इससे न केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, होम-स्टे और एडवेंचर गतिविधियों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
रोमांच, इतिहास और प्रकृति का यह संगम आने वाले समय में छत्तीसगढ़ पर्यटन के नक्शे पर शिशुपाल पर्वत को एक विशिष्ट पहचान दिलाने की क्षमता रखता है।





