Kidney Disease Crisis in Supabeda : गरियाबंद जिले के सुपेबेड़ा गांव से एक बार फिर दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। गांव के 49 वर्षीय प्रेमजय क्षेत्रपाल, जो लंबे समय से किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे, इलाज के दौरान एम्स में दम तोड़ बैठे। पिछले पांच वर्षों से वे घर पर ही पेरिटोनियल डायलिसिस कर रहे थे, लेकिन तकनीकी जटिलताओं के चलते उनका नियमित इलाज बाधित हो गया।
फिस्टुला ब्लॉक होने से बिगड़ी हालत
बताया गया कि प्रेमजय के पेट में लगाया गया डायलिसिस फिस्टुला करीब 20 दिनों से ब्लॉक था, जिससे रोजाना तीन बार होने वाली प्रक्रिया बंद हो गई। इस दौरान शरीर में टॉक्सिन बढ़ते चले गए, और स्थिति तेजी से गंभीर होती चली गई। परिजनों ने समय रहते उन्हें एम्स पहुंचाया, लेकिन तब तक उनकी हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी।
वैकल्पिक डायलिसिस पर सहमति न बन पाई
एम्स में डॉक्टरों ने हाथ में वैस्कुलर एक्सेस बनाकर डायलिसिस शुरू करने का विकल्प दिया था, लेकिन मरीज की सहमति नहीं बन पाई। इलाज की प्रक्रिया में हुई देरी, मानसिक दबाव और शारीरिक कमजोरी ने स्थिति और जटिल कर दी। आखिरकार इलाज के दौरान ही मरीज की मौत हो गई, जिससे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
एक ही परिवार में कई मौतों की त्रासदी
प्रेमजय के माता-पिता और एक भाई समेत परिवार के आठ से अधिक सदस्य पहले ही किडनी की बीमारी से जान गंवा चुके हैं। यह आंकड़ा गांव में फैली बीमारी की भयावहता को उजागर करता है। स्थानीय स्वास्थ्य अमले ने मौत की पुष्टि करते हुए कहा कि यह मामला पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।
पंचायत रिकॉर्ड बनाम सरकारी आंकड़े
पंचायत रिकॉर्ड के मुताबिक 2005 से अब तक सुपेबेड़ा में किडनी रोग से 133 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सरकारी दस्तावेजों में यह संख्या 70 से 80 के बीच बताई जाती है। आंकड़ों का यह अंतर जमीनी सच्चाई और प्रशासनिक रिपोर्टिंग के बीच की खाई को साफ दिखाता है। इसी वजह से गांववाले खुद को अक्सर “अदृश्य पीड़ित” मानते हैं।
आज भी 40 से ज्यादा मरीज जूझ रहे
गांव में फिलहाल 40 से अधिक किडनी रोगी जीवित हैं, जिनमें से तीन का इलाज एम्स में चल रहा है। कई परिवार आर्थिक मजबूरी में दूसरे राज्यों के अस्पतालों का सहारा ले रहे हैं। बीमारी का डर इतना बढ़ गया है कि लोग अब खून की जांच तक कराने से कतराने लगे हैं, जिससे समय पर बीमारी पकड़ में नहीं आ पाती।
स्वास्थ्य शिविर दो साल से बंद
पिछले दो वर्षों से गांव में किसी विशेषज्ञ टीम का स्वास्थ्य शिविर नहीं लगाया गया है। नियमित जांच और शुरुआती पहचान के अभाव में मरीज सीधे गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंच रहे हैं। यह लापरवाही (Health Camp Neglect) गांव में बढ़ती मौतों की एक बड़ी वजह बनती जा रही है।
अधूरी सुविधाएं, अधूरा भरोसा
गांव के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो स्वीकृत है, लेकिन भवन आज तक नहीं बना। डायलिसिस मशीन आई, पर इंस्टॉल नहीं हो पाई। दो डॉक्टरों की जगह अब सिर्फ एक डॉक्टर तैनात है, और नेफ्रोलॉजिस्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। साफ पानी की योजना भी फाइलों में अटकी हुई है, जो बीमारी की जड़ माने जाने वाले कारणों को और मजबूत करती है (Safe Drinking Water Issue)।
गांव की मांग – इलाज गांव तक पहुंचे
सुपेबेड़ा के लोग अब सिर्फ घोषणाओं से नहीं, ठोस व्यवस्था से उम्मीद लगाए बैठे हैं। गांववालों की मांग है कि डायलिसिस सुविधा स्थानीय स्तर पर शुरू हो, नियमित स्वास्थ्य शिविर लगें और पीने के साफ पानी की व्यवस्था तुरंत लागू हो। जब तक इलाज गांव तक नहीं पहुंचेगा, तब तक यह संकट थमने वाला नहीं है।






