सीजी भास्कर 19 फ़रवरी False Promise of Marriage Rape Case : दुर्ग जिले की फास्ट ट्रैक अदालत ने विवाह का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाने के मामले में आरोपी को 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने साफ कहा कि झूठे वादे के आधार पर दी गई सहमति को स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता, इसलिए ऐसा कृत्य कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है। यह फैसला (Fast Track Court Durg) के जरिए ऐसे मामलों में एक मजबूत नजीर के तौर पर देखा जा रहा है।
अदालत की स्पष्ट व्याख्या
अपर सत्र न्यायाधीश (एफटीसी) अवध किशोर की अदालत ने सत्र प्रकरण क्रमांक 62/2024 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए कहा कि सहमति यदि भ्रम में दी गई हो तो वह वैध नहीं मानी जा सकती। अदालत की टिप्पणी ने (Consent Under Deception) की अवधारणा को स्पष्ट किया और पीड़िता के अधिकारों को केंद्र में रखा।
सोशल मीडिया से शुरू हुई पहचान
अभियोजन के मुताबिक, जून 2022 में दोनों की पहचान सोशल मीडिया के जरिए हुई थी। बातचीत के दौरान आरोपी ने विवाह की मंशा जताई, भरोसा दिलाया और संपर्क बढ़ाया। समय के साथ यह भरोसा पीड़िता के लिए भावनात्मक आधार बन गया, जिस पर आगे की घटनाएं टिकीं।
पहली मुलाकात और बढ़ता भरोसा
23 जुलाई 2022 को रायपुर के एक मॉल में पहली मुलाकात हुई। आरोपी ने यह कहते हुए भरोसा और पुख्ता किया कि परिवार की सहमति हो या न हो, वह शादी करेगा। इसी भरोसे ने आगे पीड़िता के निर्णयों को प्रभावित किया, जिसकी पुष्टि बाद में अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों से हुई।
कमरे में ले जाकर संबंध और आश्वासन
नवंबर 2022 में आरोपी पीड़िता को पदुम नगर स्थित कमरे में ले गया। वहां उसने विवाह का वादा दोहराया और शारीरिक संबंध बनाए। पीड़िता के विरोध पर आरोपी ने “भविष्य की पत्नी” होने का तर्क देकर दबाव बनाया, जिसे अदालत ने मानसिक दबाव की श्रेणी में माना।
एक ही महिला के साथ बार-बार शोषण
पीड़िता ने अदालत में बताया कि 2022 से 2023 के बीच कई बार इसी तरह संबंध बनाए गए। इस निरंतरता को अदालत ने (Repeated Sexual Assault) की श्रेणी में रखा और माना कि आरोपी का उद्देश्य शुरुआत से ही विवाह नहीं, बल्कि शोषण था।
सगाई की खबर से टूटा भरोसा
फरवरी 2024 में आरोपी की दूसरी युवती से सगाई की जानकारी सामने आई। विरोध पर आरोपी पहले टालमटोल करता रहा, फिर रिश्ते से इनकार करने लगा। परिवारों की बैठक में सहमति जताने के बाद भी आरोपी ने कुछ ही दिनों में दूसरी जगह विवाह कर लिया, जिससे पीड़िता का आरोप और मजबूत हुआ।
साक्ष्यों से खुली सच्चाई
विचारण के दौरान आरोपी ने संबंधों से ही इनकार किया, लेकिन डिजिटल साक्ष्य, चैट और गवाहों के बयान उसके दावों के विपरीत पाए गए। अदालत ने कहा कि पीड़िता के बयान हर स्तर पर एक जैसे रहे, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर कोई संदेह नहीं बनता।
सजा और कानूनी संदेश
अदालत ने आरोपी को 10 साल सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा सुनाते हुए स्पष्ट किया कि कानून ऐसे मामलों में नरमी नहीं बरतेगा। यह फैसला उन पीड़ितों के लिए भी संदेश है जो झूठे वादों में फंसकर चुप रह जाते हैं—कानून उनके साथ खड़ा है।






