सीजी भास्कर, 20 फरवरी | Chhattisgarhi Literary Icon Centenary : छत्तीसगढ़ की माटी, नदियाँ, जंगल, खेत-खार और मेहनतकश मनखे—इन्हीं से बनी एक उजली पहचान थी पं. श्यामलाल चतुर्वेदी। साधगी के भीतर आत्मसम्मान, बोली में अपनापन और व्यवहार में सच्चाई—उनकी छवि (Cultural Roots of Chhattisgarh) की जीवंत मिसाल थी। शहरों में लंबे समय रहने के बाद भी देसीपन उनका ठाठ रहा।
जीवन की दिशा, मूल्य की कसौटी
सफेद धोती-कुर्ता, खादी की जैकेट, और बेझिझक ‘देहाती’ कहे जाने का गर्व—यही उनकी पहचान थी। उनका मानना था कि मातृभाषा में बोलना शर्म नहीं, संस्कार है। यही सोच (Chhattisgarhi Language Pride) को पीढ़ियों तक जोड़ती चली गई।
गाँव से शुरू हुई यात्रा
उनका जन्म अकलतरा क्षेत्र के कोटमीसोनार गाँव में हुआ। बचपन से पढ़ाई-लिखाई की ललक, फिर साहित्य की ओर झुकाव—धीरे-धीरे वे पत्रकारिता और लोकसंस्कृति के पुल बन गए। शुरुआती संघर्षों ने उन्हें जमीन से जोड़े रखा; यही जमीन उनकी रचनाओं में साँस बनकर बोलती रही।
आकाशवाणी से दूरदर्शन तक पहचान
छत्तीसगढ़ी कविता, कहानी और लोककथा को मंच मिला तो श्रोताओं-दर्शकों तक उनकी आवाज़ पहुँची। नागपुर, भोपाल, रायपुर, बिलासपुर केंद्रों से रचनाओं का प्रसारण हुआ; दूरदर्शन पर प्रस्तुतियाँ चलीं। यह दौर (Folk Literature Revival) के रूप में याद किया जाता है।
पत्रकारिता और जनसरोकार
गाँव से पत्रकारिता शुरू कर उन्होंने खबर को समाज की धड़कन बनाया। बाद में बिलासपुर में प्रतिनिधित्व, संपादन की जिम्मेदारियाँ—हर जगह उनका जोर जनहित पर रहा। उनकी लेखनी (Grassroots Journalism) की कसौटी पर खरी उतरती थी।
सार्वजनिक जीवन में सादगी
राजनीतिक मैदान में उतरकर भी उन्होंने खर्च-संयम और साइकिल से प्रचार जैसी सादगी को नहीं छोड़ा। सरपंच रहते हुए दारू-जुआ बंद कराने, पेड़ लगाने, स्कूल खुलवाने जैसे काम—ये उनके कर्मयोग की मिसाल बने।
शिक्षा, शोध और रचना-धरोहर
मेट्रिक से लेकर एम.ए. तक की पढ़ाई के साथ उनकी कविताएँ पाठ्यक्रमों और शोध का विषय बनीं। ‘पर्रा भर लाई’ जैसी कृतियाँ और ‘बेटी के बिदा’ जैसी अमर रचनाएँ (Chhattisgarhi Poetry Legacy) का स्थायी अध्याय हैं।
राजभाषा की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति
छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिलाने की मुहिम में वे मुखर रहे। बाद में बने आयोग की अगुवाई ने भाषा-संस्कृति के संरक्षण को संस्थागत आधार दिया। यह योगदान (State Language Movement) की नींव माना जाता है।
सम्मान और स्मृति
राष्ट्रीय-राज्य स्तरीय सम्मानों के साथ उनकी असली पूँजी लोगों की स्मृतियों में बसी है। आज, सौ बरस की यह स्मृति-श्रद्धांजलि बताती है कि व्यक्तित्व बड़ा हो तो माटी भी उजली हो जाती है।






