सीजी भास्कर, 21 फरवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट (High Court Maintenance Order) किया है कि पति केवल आरोप लगाकर पत्नी को गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि दूसरी शादी या किसी अन्य संबंध का आरोप लगाना पर्याप्त आधार नहीं है, जब तक कि इसे प्रमाणित न किया जाए। इसी के साथ अदालत ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पति को पत्नी को गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
मामला जशपुर जिले का है, जहां वर्ष 2009 में एक युवक और युवती का विवाह हुआ था। इस दंपति की तीन बेटियां हैं। समय के साथ पारिवारिक संबंधों में तनाव बढ़ता गया और पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया और बाद में दूसरी महिला के साथ रहने लगा। इसके बाद पत्नी को घर से बाहर कर दिया गया, जिससे वह आर्थिक और सामाजिक रूप से असुरक्षित स्थिति में पहुंच गई।
अपने अधिकारों की रक्षा के लिए महिला ने परिवार न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और भरण-पोषण (High Court Maintenance Order) की मांग की। मामले की सुनवाई के बाद परिवार न्यायालय ने पति को पत्नी के लिए नियमित गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। इस फैसले को चुनौती देते हुए पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की और दावा किया कि पत्नी ने स्वयं घर छोड़ा है तथा उसने किसी अन्य व्यक्ति से चूड़ी प्रथा के तहत विवाह कर लिया है, इसलिए वह भरण-पोषण की पात्र नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पति की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल आरोपों के आधार पर पत्नी को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया (High Court Maintenance Order) जा सकता। कोर्ट ने माना कि परिवार न्यायालय ने उपलब्ध दस्तावेजों, साक्ष्यों और परिस्थितियों का समुचित परीक्षण करने के बाद ही निर्णय दिया था, इसलिए उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी और परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए गुजारा भत्ता आदेश को प्रभावी बनाए रखा। यह निर्णय उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां पत्नी को घर से अलग रहने के बाद आर्थिक सहयोग की आवश्यकता होती है।






