राजधानी रायपुर में पुनर्वास की दिशा में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने सुरक्षा और समाज के रिश्ते को नए ढंग से सामने रखा। आत्मसमर्पण कर चुके पूर्व नक्सलियों को शहर के बीचों-बीच स्थित नंदन वन जंगल सफारी घुमाया गया, जहां उन्होंने सामान्य नागरिकों की तरह समय बिताया। इस दौरान कई लोगों ने पहली बार शहर का यह हिस्सा देखा, खुले माहौल में बैठकर बातचीत की, और अपने भीतर के डर व असहजता को पीछे छोड़ने की बात कही। यह पहल (Naxal Surrender Rehabilitation) के तहत विश्वास बहाली की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
गृह मंत्री की पहल, औपचारिकता से आगे की बातचीत
इस कार्यक्रम के बाद प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा ने सभी आत्मसमर्पित लोगों को अपने सरकारी निवास पर भोजन के लिए आमंत्रित किया। औपचारिक बैठक की बजाय यह मुलाकात एक सहज बातचीत की तरह रही, जिसमें हर व्यक्ति से अलग-अलग हालचाल पूछा गया। किसी ने रोज़गार की चिंता साझा की, तो किसी ने परिवार से जुड़ने की इच्छा। यह बातचीत सिर्फ फाइलों में दर्ज आँकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जमीन पर दिख रही चुनौतियों को समझने की कोशिश थी।
सामान्य जीवन की ओर लौटने की कोशिश
आत्मसमर्पण कर चुके लोगों का कहना है कि अब वे खुद को पहले की तुलना में ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। कुछ लोगों ने बताया कि वे छोटे कामों से शुरुआत कर रहे हैं, कोई प्रशिक्षण ले रहा है, तो कोई अपने गांव लौटकर खेती-किसानी से जुड़ने की योजना बना रहा है। बातचीत के दौरान यह बात साफ दिखी कि पुनर्वास सिर्फ आर्थिक मदद तक सीमित नहीं, बल्कि भरोसा लौटाने की प्रक्रिया है। इसी सोच के तहत यह पहल (Rehabilitation Policy India) के तौर पर देखी जा रही है।
विधानसभा भ्रमण से लोकतंत्र की समझ
कार्यक्रम का अगला पड़ाव छत्तीसगढ़ विधानसभा का भ्रमण है, जहां आत्मसमर्पित लोग विधानसभा की कार्यवाही को करीब से देखेंगे। अधिकारियों का मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नजदीक से देखने से व्यवस्था को लेकर उनकी सोच बदलेगी और मुख्यधारा से जुड़ाव मजबूत होगा। यह अनुभव उनके लिए केवल एक औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि व्यवस्था को समझने का अवसर माना जा रहा है। इसे (Mainstreaming Former Naxals) के रूप में देखा जा रहा है।
पुनर्वास नीति का मानवीय चेहरा
सरकारी स्तर पर चल रही पुनर्वास नीति का उद्देश्य सिर्फ आत्मसमर्पण कराना नहीं, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक जगह दिलाना है। जंगल सफारी से लेकर विधानसभा तक का यह पूरा कार्यक्रम उसी सोच को जमीन पर उतारने की कोशिश है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि आगे भी ऐसे संवाद आधारित कार्यक्रम जारी रहेंगे, ताकि पुनर्वास केवल योजना न रहे, बल्कि एक भरोसेमंद प्रक्रिया बन सके।






