Unique Holi Tradition: छत्तीसगढ़ के Salheona गांव में होली की तारीख पंचांग से नहीं, बल्कि सप्ताह के दिन से तय होती है। यहां रंगों का त्योहार केवल मंगलवार या शनिवार को ही मनाया जाता है। यदि होली की तिथि इन दोनों दिनों में नहीं आती, तो पूरा गांव इंतजार करता है। यही अनोखी परंपरा इसे (Chhattisgarh Cultural Tradition) के रूप में अलग पहचान देती है।
आग की घटनाओं से बदली परंपरा
करीब 100 साल पहले गांव में होली के दिन बार-बार आग लगने की घटनाएं सामने आईं। ग्रामीणों के मुताबिक, एक घर से शुरू हुई आग कई घरों तक फैल जाती थी। लगातार तीन-चार वर्षों तक ऐसा होने पर गांव के बुजुर्गों ने समाधान की तलाश की—और यहीं से शुरू हुई (Tuesday Saturday Holi) की परंपरा।
संतों की सलाह से बना नया नियम
बताया जाता है कि पूर्वजों ने संत ब्रह्म अवधूत बाबाओं से मार्गदर्शन लिया। सलाह मिली कि शांति यज्ञ मंगलवार या शनिवार को ही कराया जाए और उसी दिन ग्राम देवी-देवताओं की पूजा के बाद होली खेली जाए। तब से यह नियम गांव की आस्था का हिस्सा बन गया, जिसे आज भी (Salheona Village Holi) के रूप में निभाया जा रहा है।
पहले पूजा-हवन, फिर रंगों की शुरुआत
निर्धारित दिन से एक रात पहले विधि-विधान से होलिका दहन किया जाता है। अगले दिन सुबह करीब 10 बजे से पूजा, हवन और पूर्णाहुति होती है, जो लगभग दो घंटे तक चलती है। इसके बाद ही अबीर-गुलाल का दौर शुरू होता है। रंग खेलने का सिलसिला दोपहर से शाम तक चलता है, लेकिन अनुशासन और परंपरा का ध्यान रखते हुए।
नई पीढ़ी भी निभा रही विरासत
गांव के पंचों और बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि सामूहिक एकजुटता का प्रतीक है। नई पीढ़ी भी इसे उतनी ही श्रद्धा से निभा रही है। Baramkela क्षेत्र का यह गांव आज भी अपने नियमों के साथ होली मनाकर सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है।





