सीजी भास्कर 24 फ़रवरी बिलासपुर। (Anganwadi Worker Selection Case) से जुड़े विवाद में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने रिट अपील खारिज कर दी। पीठ ने माना कि चयन प्रक्रिया में किसी तरह की मनमानी या नियमविरुद्धता सामने नहीं आई। अदालत ने कहा कि दस्तावेज़ों की जांच समयसीमा में पूरी हुई और मेरिट के आधार पर नियुक्ति को गलत नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता।
केवंतरा-1 केंद्र से शुरू हुआ विवाद
यह मामला केवंतरा-1, तहसील मस्तूरी, जिला बिलासपुर के आंगनबाड़ी केंद्र से जुड़ा है। यहां कार्यकर्ता पद के चयन को लेकर आपत्ति उठी थी। चयन प्रक्रिया के दौरान (Merit Based Appointment) का सवाल उठाते हुए अपीलकर्ता ने यह तर्क दिया कि लंबे समय तक सहायिका के रूप में सेवा देने पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी।
सहायिका की दावेदारी बनाम मेरिट सूची
अपीलकर्ता अमृता पाटले वर्ष 2007 से सहायिका के रूप में कार्यरत थीं। 2016 में विज्ञापन जारी होने पर उन्होंने आवेदन किया, मगर मेरिट सूची में कोमल पाटले के अंक अधिक निकले। अदालत के सामने (Service Tenure vs Merit) का मुद्दा रखा गया, लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नियमों में पदोन्नति का स्वतः अधिकार नहीं बनता, चयन मेरिट के आधार पर ही होगा।
बीपीएल अंक जोड़ने की प्रक्रिया पर उठा सवाल
प्रारंभिक सूची में बीपीएल कॉलम रिक्त होने से कोमल पाटले को 6 अंक नहीं मिले थे। आपत्ति चरण में बीपीएल कार्ड प्रस्तुत होने के बाद सत्यापन कर अंक जोड़े गए। अंतिम सूची में कोमल पाटले को 55.84 और अमृता पाटले को 53.08 अंक मिले। अदालत ने (BPL Marks Verification) को नियमसम्मत मानते हुए कहा कि अंतिम सूची से पहले दस्तावेज़ देना प्रक्रिया का हिस्सा है।
कलेक्टर सही, अपर आयुक्त का आदेश पलटा गया
कलेक्टर ने चयन को वैध मानते हुए अपील खारिज की थी, जबकि अपर आयुक्त ने हस्तक्षेप कर फैसला पलट दिया। सिंगल बेंच ने कहा कि अपर आयुक्त का दखल अधिकार क्षेत्र से बाहर था। डिवीजन बेंच ने भी यही रुख अपनाते हुए (Jurisdictional Overreach) की बात कही और सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा।
कोर्ट का संदेश—बिना अवैधता हस्तक्षेप नहीं
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चयन मामलों में दखल तभी होता है जब स्पष्ट अवैधता, नियमों का उल्लंघन या दुर्भावना साबित हो। यहां ऐसा कुछ सामने नहीं आया। इसलिए कोमल पाटले की नियुक्ति बहाल रखने का आदेश उचित माना गया। इस फैसले को प्रशासनिक प्रक्रियाओं में (Judicial Restraint in Service Matters) का उदाहरण माना जा रहा है।
सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ में हुई।






