सीजी भास्कर, 26 जनवरी। नक्सलवाद से लंबे समय तक प्रभावित रहे क्षेत्र के भीतर स्थित पूवर्ती गांव में 26 जनवरी को पहली बार खुले मन से गणतंत्र दिवस (Bastar Education Initiative) मनाया गया। यह वही इलाका है, जिसे कभी भय और हिंसा का गढ़ माना जाता था। स्कूल परिसर में ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रगान हुआ, बच्चों ने देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रम प्रस्तुत किए और पूरे गांव में उत्साह व गर्व का माहौल दिखाई दिया।
इस बदलाव के पीछे शिक्षा दूतों की वह पहल है, जिसने दुर्गम परिस्थितियों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई को जारी रखा। संसाधनों की कमी और जोखिम के बीच स्थानीय युवाओं और स्वयंसेवकों ने नियमित कक्षाएं संचालित कीं। शिक्षा के माध्यम से संविधान, लोकतंत्र और राष्ट्र के प्रति समझ विकसित हुई, जिसका परिणाम इस गणतंत्र दिवस पर स्पष्ट रूप से नजर आया।
गणतंत्र दिवस का संदेश केवल गांव तक सीमित नहीं रहा। कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर भी आज़ादी के बाद पहली बार तिरंगा फहराया गया। विषम परिस्थितियों के बावजूद सुरक्षा बलों ने ध्वजारोहण कर यह संदेश दिया कि लोकतंत्र की जड़ें अब उन इलाकों तक पहुंच चुकी हैं, जहां कभी कानून का प्रवेश मुश्किल माना जाता था।
हाल ही में हुई घटनाओं के बावजूद जवानों का मनोबल अडिग रहा। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार चुनौतियों के बीच तिरंगे का फहराना (Bastar Education Initiative) यह दर्शाता है कि डर की जगह अब विश्वास ले रहा है। यह केवल सुरक्षा की मौजूदगी नहीं, बल्कि स्थायी शांति की ओर बढ़ता कदम है।
पूवर्ती सहित सुकमा जिले के ऐसे 10 गांव, जहां दशकों तक राष्ट्रीय पर्व नहीं मनाए जा सके, वहां इस बार पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया। कभी जिन हाथों में बंदूक की छाया थी, आज उन्हीं हाथों में संविधान की किताब नजर आई। लोगों ने गर्व से सिर उठाकर तिरंगे को सलामी दी और लोकतंत्र में अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
हिंसा और भय के लंबे दौर के बाद अब इन इलाकों में शांति, शिक्षा और संविधान पर भरोसे की नई सुबह दिखाई (Bastar Education Initiative) देने लगी है। यह परिवर्तन संकेत है कि अंधकार चाहे जितना गहरा हो, लोकतंत्र की रोशनी अंततः रास्ता बना ही लेती है।




