सीजी भास्कर, 29 नवंबर। हिड़मा के मारे जाने के बाद बस्तर में माओवादी संगठन अंदर से टूटता दिख रहा है। सिर्फ 10 दिनों में 161 माओवादी हथियार छोड़कर मुख्यधारा (Bastar Maoist Surrender) में लौट आए, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने अब तक का सबसे बड़ा सरेंडर अभियान बताया है। इस रणनीतिक कमजोरी ने चार दशक पुराने नक्सली ढांचे को झकझोर दिया है।
दंडकारण्य के कुख्यात कमांडर हिड़मा की मौत के बाद शीर्ष नेताओं भूपति और रूपेश के सरेंडर ने कैडर में भय और नेतृत्व संकट पैदा कर दिया। इसी अस्थिरता का असर सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और तेलंगाना तक दिखा, जहां बड़ी संख्या में माओवादी संगठन से अलग हो रहे हैं। पिछले दिनों 3 करोड़ रुपये से अधिक इनामी नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर हिंसा छोड़ने का फैसला किया।
इसी बीच एमएमसी स्पेशल जोनल कमेटी के प्रवक्ता अनंत ने पत्र और ऑडियो संदेश जारी कर 1 जनवरी 2026 को सामूहिक रूप से हथियार (Bastar Maoist Surrender) डालने की घोषणा की है। निर्देशों में अभियान से दूर रहने, संपर्क बनाए रखने और रोज 435.715 फ्रीक्वेंसी पर सुबह 11–11.15 बजे जुड़ने की बात कही गई है।
हाल के दिनों में चैतू उर्फ श्याम दादा सहित 10 इनामी माओवादी सरेंडर कर चुके हैं। 63 वर्षीय चैतू पर झीरम घाटी हमले की साजिश में शामिल होने का आरोप रहा है। उसके साथ 8 लाख के इनामी सरोज, 5–5 लाख के भूपेश, प्रकाश, कमलेश, जन्नी, संतोष, रामशीला और 1–1 लाख के नवीन व जयंति ने भी हथियार छोड़े। सभी ने पुलिस और आदिवासी समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की उपस्थिति में संविधान की प्रति थामकर मुख्यधारा में वापसी की।
मुख्यधारा में लौटकर चैतू ने कहा—“अब हथियारों (Bastar Maoist Surrender) की लड़ाई का समय खत्म हो चुका है।” वहीं रूपेश ने भी बाकी माओवादियों से जंगल छोड़कर जीवन चुनने की अपील की। बस्तर रेंज के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इसे शांति और विकास की नई शुरुआत बताया।


