छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सली हिंसा की जड़ें साल 1991 में हुए एक बड़े हमले से जुड़ी मानी जाती हैं। 20 मई 1991 को नारायणपुर-कोंडागांव मार्ग पर मतदान दल को निशाना बनाकर आईईडी ब्लास्ट किया गया था। इस घटना में एक साथ 7 लोगों की मौत हुई थी। यही वह पल था, जब बस्तर में (Bastar Naxal Violence History) ने गंभीर और खतरनाक रूप लेना शुरू किया।
लोकतंत्र पर पहला बड़ा वार
इस हमले की खास बात यह थी कि निशाना कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े लोग थे। इससे साफ संकेत मिला कि नक्सलियों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देने की रणनीति अपनाई है। इसके बाद इलाके में (Naxal Attack Pattern) तेजी से बदला और बारूदी सुरंगों, घात लगाकर हमले और अपहरण जैसी घटनाएं बढ़ती चली गईं।
30 साल तक हिंसा का साया
पिछले तीन दशकों में बस्तर क्षेत्र लगातार नक्सली हिंसा से जूझता रहा। गांवों से लेकर सड़कों तक, हर जगह डर का माहौल बना रहा। कई बड़े हमले हुए, जिनमें सुरक्षाबलों और आम लोगों दोनों को निशाना बनाया गया। हालांकि, समय के साथ सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी रणनीति बदली और (Anti Naxal Operations) को ज्यादा आक्रामक तरीके से लागू किया।
आंकड़ों में दिखा बदलाव
वर्ष 2025 को नक्सल विरोधी अभियान के लिहाज से निर्णायक माना जा रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस साल करीब 100 मुठभेड़ों में 256 नक्सली मारे गए। वहीं 1573 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और 898 को गिरफ्तार किया गया। इन आंकड़ों से साफ होता है कि (Naxal Surrender Data) में बड़ा इजाफा हुआ है और संगठन की पकड़ कमजोर पड़ी है।
लगातार दबाव से कमजोर हुआ नेटवर्क
सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ सालों में रणनीतिक ऑपरेशन, स्थानीय इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाया है। इसका असर यह हुआ कि नक्सलियों का नेटवर्क धीरे-धीरे टूटता नजर आ रहा है। अधिकारियों का कहना है कि लगातार दबाव और सटीक कार्रवाई से आने वाले समय में और बेहतर नतीजे सामने आ सकते हैं।


