Bastar Youth Role Model Debate: जगदलपुर में आयोजित भूमकाल स्मृति दिवस कार्यक्रम के दौरान एक विवादित गीत बजने के बाद बस्तर में युवाओं के रोल मॉडल को लेकर बहस तेज हो गई। मंच और मैदान—दोनों जगहों पर चर्चा का केंद्र यह रहा कि आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत कौन होने चाहिए, और किन प्रतीकों से दूरी बनाए रखना जरूरी है। इसी घटनाक्रम के बाद (Public Memory Politics) पर नए सिरे से सवाल खड़े हो गए।
महिमामंडन बनाम चेतावनी की रेखा
बस्तर सांसद महेश कश्यप ने आरोप लगाया कि कुछ समूह योजनाबद्ध ढंग से माओवादी विचारधारा से जुड़े चेहरों को युवाओं के सामने आदर्श के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, पहले “जल-जंगल-ज़मीन” की भाषा में भ्रम फैलाया गया और अब (Maoist Glorification Issue) के जरिए हिंसा को सामान्य बनाने का प्रयास दिख रहा है।
नक्सलवाद की कीमत और टूटता विकास
सांसद ने कहा कि नक्सलवाद ने बस्तर को दशकों तक अस्थिरता में रखा, निर्दोष जानें गईं और विकास की रफ्तार थमी रही। गांव-कस्बों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की संभावनाएं कमजोर पड़ीं, जिसका असर आज की पीढ़ी तक महसूस किया जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में युवाओं के लिए (Tribal Youth Narrative) गढ़ने की कोशिशें खतरनाक दिशा ले सकती हैं।
आदिवासी समाज के प्रेरणास्रोत कौन
महेश कश्यप ने स्पष्ट किया कि आदिवासी समाज के प्रेरणास्रोत हिंसा के प्रतीक नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के जननायक होने चाहिए। उन्होंने गुंडाधुर, डेबरीधुर और झाड़ा सिरहा जैसे नामों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन्हीं संघर्षशील व्यक्तित्वों से अस्मिता और स्वाभिमान की सीख मिलती है।
बहस अब राजनीति नहीं, दिशा का सवाल
स्थानीय युवाओं और सामाजिक संगठनों के बीच यह बहस केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रही। कई लोगों का मानना है कि प्रतीकों का चुनाव आने वाली पीढ़ी की सोच तय करता है। इसी वजह से यह मुद्दा अब सियासत से आगे बढ़कर सामाजिक दिशा और सामूहिक चेतना का सवाल बन गया है।






