सीजी भास्कर, 20 सितंबर। छत्तीसगढ़ में सड़क हादसों ने एक बार फिर मवेशियों की सुरक्षा (Cattle Safety Crisis) पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 16 सितंबर की रात को हुए तीन अलग-अलग हादसों में कुल 17 गायों की मौत हो गई। सबसे दर्दनाक घटना में एक गर्भवती गाय का पेट फट गया और उसका बछड़ा बाहर आ गया। इन घटनाओं ने प्रशासन और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इन हादसों पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि केवल योजनाएं और घोषणाएं (Cattle Safety Crisis) काफी नहीं हैं। उन्हें जमीन पर लागू करना भी जरूरी है। चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि वेलफेयर स्टेट की जिम्मेदारी केवल फंड जारी करना या अधिकारी नियुक्त करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि (Cattle Safety Crisis) से जुड़े उपायों का असर दिखे।
हादसों की पूरी तस्वीर
पहली घटना बिलासपुर-कोरबा नेशनल हाईवे पर हुई, जहां तेज रफ्तार ट्रक ने मवेशियों के झुंड को कुचल दिया और आठ गायों की मौत हो गई। दूसरी घटना दुर्ग जिले में बाफना टोल प्लाजा के पास हुई, जहां एक कंटेनर ने आठ मवेशियों को रौंद दिया। तीसरी घटना कांकेर जिले के चारामा में NH-30 पर हुई, जिसमें ट्रक की चपेट में आने से दो मवेशियों की मौत हो गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शाम ढलते ही बड़ी संख्या में मवेशी सड़कों पर बैठ जाते हैं। ऐसे में तेज रफ्तार वाहन इन्हें टक्कर मार देते हैं। अधिकारियों ने हाईकोर्ट (Cattle Safety Crisis) में दावा किया कि रात 8 बजे तक गश्त की जाती है, लेकिन कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब अधिकतर हादसे रात के बाद हो रहे हैं, तो इस गश्त का क्या लाभ।
सरकार को दिए निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि सभी सुझावों पर पुनर्विचार किया जाए। शहर और हाईवे पर मवेशियों की मौजूदगी रोकी जाए, उनके लिए स्थायी आश्रय, पानी और चारे की व्यवस्था की जाए। कोर्ट ने कहा कि पंचायत से लेकर नगर निगम तक हर स्तर पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और (Cattle Safety Crisis) को गंभीरता से हल किया जाना चाहिए।
हाल की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
सिर्फ इन तीन हादसों में ही 17 मवेशियों की जान गई है। हाल ही में रतनपुर और मस्तूरी-जयरामनगर रोड पर हुए हादसों में भी 14 मवेशी कुचले गए थे, जिनमें से 10 की मौत हो गई थी। लगातार हो रही ये घटनाएं केवल प्रशासनिक लापरवाही को ही नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या को भी उजागर करती हैं। चराई भूमि की कमी और गौशालाओं की स्थिति आज बड़ी चुनौती बन चुकी है।


