सीजी भास्कर, 17 मार्च। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एसईसीएल की टेंडर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते (Chhattisgarh High Court Judgment SECL) हुए अहम टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस Ramesh Sinha और जस्टिस Ravindra Kumar Agrawal की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि टेंडर की शर्तों की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार उसी संस्था के पास होता है, जिसने टेंडर जारी किया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक किसी निर्णय में स्पष्ट मनमानी या दुर्भावना साबित नहीं होती, तब तक न्यायालय ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
किस टेंडर को लेकर हुआ विवाद, क्या था पूरा मामला
मामला South Eastern Coalfields Limited द्वारा कोरबा क्षेत्र की बगदेवा भूमिगत खदान के लिए जारी ट्रायल टेंडर से जुड़ा है। इस टेंडर में नवनिर्मित स्वदेशी कंटीन्युअस माइनर मशीन की शर्त रखी गई थी।
रायपुर की एक कंपनी ने सैंडविक मॉडल एमसी-350 मशीन का प्रस्ताव देते (Chhattisgarh High Court Judgment SECL) हुए दावा किया कि इसमें 57% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है, इसलिए इसे नवनिर्मित माना जाना चाहिए।
लेकिन एसईसीएल की टेक्निकल कमेटी ने यह कहते हुए बोली खारिज कर दी कि यही मॉडल पहले से ही एक अन्य खदान में उपयोग में है, जबकि टेंडर की शर्त स्पष्ट थी कि मशीन पूरी तरह नई होनी चाहिए और देश की किसी भी खदान में पहले इस्तेमाल नहीं हुई हो।
कोर्ट की टिप्पणी – निर्णय लेने का अधिकार प्राधिकरण के पास
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि टेंडर जारी करने वाली एजेंसी अपने प्रोजेक्ट की जरूरतों को बेहतर तरीके से समझती है, इसलिए उसे शर्तों की व्याख्या करने का अधिकार होना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक हस्तक्षेप तभी संभव है, जब निर्णय पूरी तरह से अनुचित, मनमाना या दुर्भावनापूर्ण हो। इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं पाया गया।
ChatGPT के इस्तेमाल पर भी उठा सवाल, कोर्ट ने दिया जवाब
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि एसईसीएल ने “नवनिर्मित” शब्द की व्याख्या के लिए एआई टूल ChatGPT का सहारा (Chhattisgarh High Court Judgment SECL) लिया, जो नियमों के खिलाफ है। हालांकि कोर्ट और इंडिपेंडेंट एक्सटर्नल मॉनिटर्स ने पाया कि विभाग ने अपना निर्णय प्री-बिड स्पष्टीकरण और तकनीकी आधार पर लिया था। एआई का उपयोग केवल सामान्य समझ के लिए किया गया था, जिससे अंतिम निर्णय की वैधता प्रभावित नहीं होती।
फैसले से टेंडर प्रक्रिया को मिला स्पष्ट संदेश
हाईकोर्ट के इस फैसले को टेंडर प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि तकनीकी शर्तों की व्याख्या में अंतिम निर्णय संबंधित एजेंसी का ही होगा, जब तक उसमें किसी प्रकार की अनियमितता साबित न हो।





