राज्य गठन के ढाई दशक बाद भी नगर सेना में तैनात महिला कर्मियों को मातृत्व अवकाश जैसा बुनियादी अधिकार नहीं मिल पा रहा है। कागज़ों में अधिकारों की चर्चा होती रही, पर ज़मीनी अमल आगे नहीं बढ़ा। नतीजा यह कि (Civic Defense Maternity Leave) आज भी कई महिला कर्मचारियों के लिए सिर्फ एक उम्मीद बनकर रह गया है।
मातृत्व के दौर में वेतन शून्य
डिलीवरी के बाद कुछ समय की छुट्टी मिल भी जाती है, तो आगे का समय “काम नहीं, तो वेतन नहीं” की शर्त पर गुजरता है। परिवार की ज़िम्मेदारियों और नवजात की देखभाल के बीच वेतन कटना कई परिवारों के लिए दोहरी मार साबित हो रहा है। इस व्यवस्था ने (No Work No Pay Policy) को मातृत्व जैसे संवेदनशील दौर से जोड़ दिया है।
संख्या है, सुरक्षा नहीं
नगर सेना में महिला कर्मियों की संख्या हज़ारों में है। वे कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे कार्यों में दिन-रात डटी रहती हैं। इसके बावजूद (Women in Civic Defense) को मातृत्व अवधि में संस्थागत सुरक्षा और आर्थिक सहारा नहीं मिल पा रहा है, जो उनके सम्मान और स्वास्थ्य—दोनों पर असर डालता है।
कानून मौजूद, लागू नहीं
कानून और न्यायिक व्याख्याएं मातृत्व अवकाश को महिला के जीवन और गरिमा से जोड़ती हैं। नियमों में प्रावधान होने के बावजूद विभागीय प्रक्रियाओं में अटके प्रस्तावों के कारण (Maternity Rights India) का लाभ नगर सेना की महिलाओं तक नहीं पहुंच पा रहा है। वित्तीय स्वीकृति के अभाव में फाइलें लौटना अब एक पुरानी कहानी बन चुकी है।
समाधान की दिशा में क्या बदले?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि मातृत्व अवकाश को सेवा शर्तों में स्पष्ट रूप से जोड़ा जाए, बजट प्रावधान तय हों और भुगतान योग्य अवकाश की व्यवस्था लागू की जाए। इससे न केवल (Civic Defense Maternity Leave) का व्यावहारिक अमल होगा, बल्कि महिला कर्मियों का मनोबल और कार्यक्षमता भी मजबूत होगी।




