Danghai Holi in Janjgir Champa: छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के पंतोरा गांव में होली का उत्सव आम रंग-गुलाल से अलग, परंपरा और आस्था के संग मनाया जाता है। यहां रंग पंचमी के दिन (Pantora Village Holi) के नाम से पहचानी जाने वाली डंगाही होली में कुंवारी कन्याएं पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस ‘मार’ में माता का आशीर्वाद छिपा होता है, जो सालभर स्वास्थ्य और सुरक्षा देता है।
मां भवानी मंदिर से होती है परंपरा की शुरुआत
डंगाही होली का शुभारंभ गांव के मां भवानी मंदिर से होता है। पहले देवस्थल पर छड़ी का अनुष्ठान किया जाता है, फिर कन्याओं की टोली मंदिर द्वार पर खड़ी होकर गुजरने वालों पर प्रतीकात्मक प्रहार करती है। इस पूरे आयोजन को (Danghai Holi Tradition) के रूप में देखा जाता है, जहां आस्था, परंपरा और उत्सव एक साथ चलते हैं—कहीं भी हिंसा का भाव नहीं होता।
कोरबा के जंगल से लाई जाती है ‘एक वार में कटने वाली’ बांस
इस परंपरा के लिए विशेष बांस कोरबा जिले के मड़वारानी जंगल से लाया जाता है। वही बांस चुना जाता है जो एक ही कुल्हाड़ी के वार में कट जाए—इसे शुभ संकेत माना जाता है। इन छड़ियों को मंदिर में अभिमंत्रित कर पुजारी द्वारा सिद्ध कराया जाता है, ताकि (Lathi Ritual Holi) के दौरान यह ‘प्रसाद’ का रूप ले सके।
‘मार’ को प्रसाद मानने की लोक-मान्यता
ग्रामीणों का मानना है कि अभिमंत्रित छड़ी की मार माता का प्रसाद है। इसी विश्वास के चलते बच्चे, युवा और बुजुर्ग—सब बिना विरोध के इस परंपरा में शामिल होते हैं। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि इस दिन मिली ‘मार’ से रोग-व्याधियां दूर रहती हैं और वर्ष भर अनहोनी से रक्षा होती है—यह विश्वास पीढ़ियों से चला आ रहा है।
राहगीर भी रुकते हैं, उत्सव में खुद को करते हैं शामिल
खास बात यह है कि रास्ते से गुजरने वाले राहगीर भी इस अनोखे पर्व में रुककर भाग लेते हैं। कोई इसे कौतूहल से देखता है, कोई आस्था से स्वीकार करता है। ढोल-नगाड़ों की थाप, हंसी-मजाक और सामूहिक उल्लास के बीच यह परंपरा (Pantora Village Holi) की पहचान बन चुकी है—जहां होली सिर्फ रंगों का नहीं, विश्वास और लोक-संस्कृति का उत्सव है।






