सीजी भास्कर 3 फ़रवरी देश की सर्वोच्च अदालत ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए एक साफ लकीर खींच दी है। Data Privacy India को लेकर सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत में काम करने वाली किसी भी टेक कंपनी को संविधान और नागरिक अधिकारों के साथ समझौता करने की छूट नहीं दी जा सकती। यूजर की निजता को लेकर अदालत का रुख बेहद सख्त नजर आया।
Data Privacy India और डेटा साझा करने पर लिखित भरोसे की मांग
सुनवाई के दौरान अदालत ने Meta और WhatsApp को निर्देश दिया कि वे हलफनामा देकर यह स्पष्ट करें कि भारतीय यूजर्स का डेटा साझा नहीं किया जाएगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि कंपनियां इस विषय पर साफ और लिखित आश्वासन देने से बचती हैं, तो उनकी याचिका पर विचार नहीं किया जाएगा। (User Data Protection) को अब केवल नीति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना गया।
अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि किसी निजी कंपनी की आंतरिक पॉलिसी, देश के नागरिकों के मूल अधिकारों से ऊपर कैसे हो सकती है। पीठ ने कहा कि कोई भी व्यावसायिक मॉडल ऐसा नहीं हो सकता, जिसमें मुनाफा यूजर की निजता की कीमत पर खड़ा हो। (Digital Rights India) पर अदालत की यह टिप्पणी आने वाले मामलों के लिए दिशा तय करती है।
Data Privacy India और प्राइवेसी पॉलिसी की जटिल भाषा
सुनवाई के दौरान WhatsApp की प्राइवेसी पॉलिसी की भाषा पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई। अदालत ने कहा कि पॉलिसी इतनी तकनीकी और जटिल है कि एक आम यूजर उसके निहितार्थ समझ ही नहीं सकता। अदालत के मुताबिक, सहमति तभी मान्य मानी जाएगी जब वह सचमुच “सूचित” हो—सिर्फ टिक बॉक्स भर देना पर्याप्त नहीं है।
मामले में यह सवाल भी उभरा कि क्या यूजर डेटा का कोई मौद्रिक मूल्य है और अगर है, तो उसका उपयोग किस हद तक जायज है। अदालत ने संकेत दिया कि डेटा का हर उपयोग—चाहे वह ट्रेंड एनालिसिस हो, टार्गेटेड विज्ञापन हो या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां—जवाबदेही के दायरे में आएगा। (Data Monetization Rules) को लेकर स्पष्टता जरूरी बताई गई।
Data Privacy India और आगे की राह
अदालत के रुख से यह साफ हो गया है कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अब केवल लोकप्रियता या यूजर संख्या के आधार पर नहीं देखा जाएगा। उन्हें यह भी दिखाना होगा कि वे नागरिकों की निजता, कानून और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करते हैं। आने वाले समय में यह मामला देश की डिजिटल नीति के लिए एक अहम मिसाल बन सकता है।




