सीजी भास्कर, 02 जनवरी। हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की संभावित आखिरी फिल्म इक्कीस दर्शकों के बीच भावनात्मक (Dharmendra Last Film) चर्चा का विषय बनी हुई है। फिल्म का निर्देशन श्रीराम राघवन ने किया है और इसकी कहानी 1971 के युद्ध में परमवीर चक्र से सम्मानित अरुण खेत्रपाल की वीरगाथा पर आधारित है।
हालांकि फिल्म की आत्मा सशक्त है, लेकिन इसकी कुछ रचनात्मक और तकनीकी कमियां दर्शकों के एक वर्ग के लिए अनुभव को सीमित कर सकती हैं।
कहानी की धीमी रफ्तार
श्रीराम राघवन अपनी ‘स्लो-बर्न’ स्टोरीटेलिंग के लिए जाने जाते हैं, लेकिन ‘इक्कीस’ के पहले (Dharmendra Last Film) हिस्से में यह शैली जरूरत से ज्यादा हावी हो जाती है। किरदारों की पृष्ठभूमि और नॉस्टैल्जिया पर लंबा फोकस कहानी की गति को थाम लेता है, जिससे धैर्यवान दर्शक ही अंत तक टिक पाते हैं।
टाइमलाइन का उलझा हुआ स्ट्रक्चर
फिल्म 1971 के युद्ध और 2001 के घटनाक्रम के बीच बार-बार छलांग लगाती है। ये अचानक टाइम जंप इमोशनल कनेक्ट को कमजोर करते हैं और कई बार दर्शक यह समझने में उलझ जाते हैं कि वे किस दौर में हैं।
संगीत याद नहीं रह पाता
हालांकि बैकग्राउंड स्कोर युद्ध के तनाव को महसूस कराने (Dharmendra Last Film) में सफल है, लेकिन गाने फिल्म की आत्मा में घुलते नहीं हैं। कोई भी म्यूजिकल पीस ऐसा नहीं है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी याद रह सके।
एंटी-क्लाइमेक्स का प्रभाव
फिल्म का अंत न तो पूरी तरह झकझोरता है और न ही पारंपरिक वॉर ड्रामा जैसा कैथार्सिस देता है। यह सादगी कुछ दर्शकों को वास्तविक लगेगी, लेकिन कई लोगों को यह अधूरा और फीका भी लग सकता है।
मास ऑडियंस से दूरी
‘इक्कीस’ में न तो भारी डायलॉगबाजी है और न ही देशभक्ति को उग्र नारों के रूप में पेश किया गया है। यही इसकी ईमानदारी है, लेकिन यही वजह है कि केवल मनोरंजन या एक्शन की उम्मीद रखने वाले दर्शकों को फिल्म धीमी और गंभीर लग सकती है।
अंतिम शब्द
‘इक्कीस’ एक संवेदनशील, गरिमामय और भावनात्मक वॉर बायोपिक (Dharmendra Last Film) है, जो धमाकों से ज्यादा इंसानी जज़्बातों पर भरोसा करती है। यह फिल्म धर्मेंद्र जैसे अभिनेता की शांत, सम्मानजनक विदाई भी बन सकती है, लेकिन इसकी सादगी और गंभीरता हर दर्शक के स्वाद के अनुकूल हो — यह जरूरी नहीं।





