सीजी भास्कर, 30 अगस्त : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम आदेश जारी करते हुए डाक्टरों को स्पष्ट व पठनीय पर्ची (Doctors Prescription Clarity Case) लिखने की कानूनी अनिवार्यता बना दी है। अदालत ने कहा कि चाहे सरकारी अस्पताल हों या निजी क्लिनिक, सभी जगह मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन और डायग्नोस्टिक नोट्स ऐसे लिखे जाएं जिन्हें हर मरीज आसानी से पढ़ और समझ सके। बेहतर होगा कि इन्हें बड़े अक्षरों (कैपिटल लेटर्स) में लिखा जाए या फिर डिजिटल/टाइप्ड रूप में उपलब्ध कराया जाए। यह आदेश एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया, जब अदालत ने पाया कि पीड़ित की मेडिकल लीगल रिपोर्ट पर डॉक्टर की लिखावट इतनी अस्पष्ट थी कि उसे पढ़ पाना नामुमकिन था।
जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी ने टिप्पणी की कि अदालत चिकित्सा पेशे के प्रति सम्मान रखती है, लेकिन यह भी जरूरी है कि मरीजों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें (Doctors Prescription Clarity Case)। उन्होंने कहा कि मरीज को अपने इलाज और स्वास्थ्य की स्थिति को समझने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में शामिल है। डाक्टरों की अपठनीय लिखावट मरीज की जिंदगी को खतरे में डाल सकती है।
कोर्ट ने पंजाब, हरियाणा और केंद्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ को निर्देश दिया कि जब तक पूरी तरह कंप्यूटरीकृत/टाइप्ड प्रिस्क्रिप्शन लागू नहीं हो जाते, तब तक सभी डॉक्टर बड़े अक्षरों में ही पर्चियां लिखें (Doctors Prescription Clarity Case)। इसके लिए जिला स्तर पर सिविल सर्जन की देखरेख में बैठकें आयोजित होंगी और डॉक्टरों को जागरूक किया जाएगा। साथ ही सरकार को नीति बनानी होगी जिससे कंप्यूटरीकृत या डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन की दिशा में काम हो सके और जरूरत पड़ने पर क्लिनिक या डॉक्टरों को वित्तीय सहायता दी जा सके। हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को भी निर्देश दिया कि मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों के पाठ्यक्रम में इस नियम को शामिल किया जाए और स्पष्ट लिखावट पर विशेष ध्यान दिया जाए।