सीजी भास्कर 24 फ़रवरी रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के दौरान प्रश्नकाल में गोबर खाद आपूर्ति से जुड़े कथित फर्जी हस्ताक्षरों का मामला सदन में गरमा गया। विपक्षी कांग्रेस विधायकों ने (Gobardhansupply Scam in Chhattisgarh) को लेकर वन मंत्री केदार कश्यप से सीधे जवाब मांगे। आरोप लगा कि फाइलों में गड़बड़ी को “जांच जारी है” कहकर टालने की कोशिश हो रही है, जिससे सदन का भरोसा कमजोर पड़ता दिखा।
मरवाही वनमंडल से उठी फर्जीवाड़े की चिंगारी
कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू ने मरवाही वनमंडल से जुड़े प्रमाणकों में फर्जी हस्ताक्षर का मुद्दा उठाते हुए कहा कि भुगतान प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता सामने आई है। उनका दावा था कि दस्तावेज़ों में जिन हस्ताक्षरों के आधार पर बिल पास हुए, उनकी सत्यता पर सवाल खड़े हो चुके हैं। इस पूरे प्रकरण को (Supply Verification) से जोड़ते हुए उन्होंने जवाबदेही तय करने की मांग की।
मंत्री का जवाब—तीन सदस्यीय समिति जांच में जुटी
वन मंत्री केदार कश्यप ने सदन में कहा कि 6 जनवरी 2026 को शिकायत प्राप्त हुई थी और उसी आधार पर तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है। मंत्री के मुताबिक रिपोर्ट आते ही दोषियों पर कार्रवाई होगी। हालांकि, विपक्ष ने इसे (Accountability Process) का नाम देकर देरी की रणनीति बताया और कहा कि जांच का बहाना बनाकर कार्रवाई टाली जा रही है।
“जांच पूरी हो चुकी है” कहकर विपक्ष का पलटवार
विधायकों ने सवाल उठाया कि यदि जांच प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है, तो अब तक कितने फर्जी बिल पास किए गए, इसकी संख्या क्यों नहीं बताई जा रही। विपक्ष का कहना था कि रिपोर्ट आ चुकी है और संबंधित अधिकारी दोषी पाए गए हैं, ऐसे में तत्काल निलंबन होना चाहिए। इस तर्क के साथ (Immediate Action) की मांग तेज हुई।
सभापति की दखल, दस्तावेज़ रखने पर लगी रोक
बहस के दौरान सदन में शोर बढ़ा तो सभापति ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि बिना आसंदी की अनुमति के कोई भी कागज पटल पर नहीं रखा जा सकता। विपक्ष ने आग्रह किया कि तथ्यों को सदन के सामने रखने दिया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे, लेकिन प्रक्रिया का हवाला देते हुए अनुमति नहीं दी गई। यह स्थिति (Legislative Procedure) के तहत बताई गई।
नेता प्रतिपक्ष का सख्त रुख, निलंबन की मांग
नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत ने कहा कि यदि अधिकारी दोषी पाए गए हैं तो उन्हें तुरंत सस्पेंड किया जाए। उनका कहना था कि जांच रिपोर्ट आने की समयसीमा स्पष्ट की जाए, ताकि कार्रवाई को टाला न जा सके। यह बयान (Political Accountability) के सवाल को और धार देता है।
रिपोर्ट की समयसीमा पर टिकी निगाहें
वन मंत्री ने भरोसा दिलाया कि समिति की रिपोर्ट मिलते ही कठोर कदम उठाए जाएंगे। मगर सदन में उठे तीखे सवालों के बाद यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता का मुद्दा बन गया है। अब सबकी निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं—क्या वाकई दोषियों पर कार्रवाई होगी या मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा?






