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Home » High Court Arbitration Appeal Dismissed : 221 दिन की देरी पर भारी पड़ी कानून की सख्ती, हाईकोर्ट ने हाईवे मुआवजा अपील खारिज की

High Court Arbitration Appeal Dismissed : 221 दिन की देरी पर भारी पड़ी कानून की सख्ती, हाईकोर्ट ने हाईवे मुआवजा अपील खारिज की

By Newsdesk Admin 13/02/2026
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High Court Arbitration Appeal Dismissed
High Court Arbitration Appeal Dismissed

सीजी भास्कर, 13 फरवरी | बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए अधिग्रहित भूमि के मुआवजे से संबंधित आर्बिट्रेशन अपील को 221 दिन की देरी के कारण खारिज (High Court Arbitration Appeal Dismissed) कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धन की कमी या कानूनी प्रक्रिया की जानकारी न होना जैसे सामान्य कारण इतनी लंबी देरी को माफ करने के लिए पर्याप्त नहीं माने जा सकते। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ में हुई।

Contents
क्या है पूरा मामलाजिला अदालत से हाईकोर्ट तककोर्ट ने देरी पर क्यों दिखाई सख्तीनतीजा

क्या है पूरा मामला

यह प्रकरण जांजगीर-चांपा जिला के सारागांव गांव से जुड़ा है, जहां निवासियों रामकृष्ण, ओंकार, महावीर, परमेश्वरी और रमेश्वरी की भूमि नेशनल हाईवे चौड़ीकरण के लिए अधिग्रहित की गई थी। 30 जुलाई 2016 को मुआवजा अवार्ड पारित किया गया, लेकिन जमीन मालिक मुआवजे की राशि से संतुष्ट नहीं थे।

इसके बाद उन्होंने नेशनल हाईवे एक्ट की धारा 3G(5) के तहत मध्यस्थ के समक्ष अपील की। मध्यस्थ ने 10 नवंबर 2017 को आदेश पारित करते हुए मुआवजे का पुनर्मूल्यांकन केंद्रीय मूल्यांकन बोर्ड, रायपुर के वर्ष 2015-16 के दिशा-निर्देशों के अनुसार करने के निर्देश दिए।

जिला अदालत से हाईकोर्ट तक

मध्यस्थ के आदेश को कार्यपालन अभियंता, लोक निर्माण विभाग (राष्ट्रीय राजमार्ग) ने आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट की धारा 34 के तहत जिला न्यायालय (High Court Arbitration Appeal Dismissed) में चुनौती दी। तृतीय जिला न्यायाधीश, जांजगीर ने वर्ष 2019 में मध्यस्थ के आदेश को निरस्त कर दिया।

इस फैसले के खिलाफ भूमि स्वामियों ने धारा 37 के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन यह अपील 221 दिन की देरी से दाखिल हुई। देरी माफी के लिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया गया।

कोर्ट ने देरी पर क्यों दिखाई सख्ती

अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि धनाभाव, कानूनी प्रक्रिया की जानकारी का अभाव और व्यक्तिगत परेशानियों के चलते समय पर अपील नहीं हो सकी। उनका कहना था कि देरी जानबूझकर नहीं की गई और इससे प्रतिवादी को कोई नुकसान नहीं होगा।

वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आर्बिट्रेशन मामलों में समय-सीमा का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए और देरी केवल अपवादस्वरूप ही माफ की जा सकती है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 221 दिन की देरी अत्यधिक है और प्रस्तुत कारण पर्याप्त (High Court Arbitration Appeal Dismissed) नहीं हैं। अदालत ने यह भी दोहराया कि देरी माफी कोई अधिकार नहीं, बल्कि न्यायालय के विवेक पर निर्भर करती है। जब देरी स्वीकार्य ही नहीं है, तो अपील पर विचार का कोई आधार नहीं बनता।

नतीजा

देरी माफी आवेदन खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेशन अपील को भी खारिज कर दिया। इस फैसले को आर्बिट्रेशन मामलों में समय-सीमा के महत्व और न्यायिक अनुशासन की कड़ी याद दिलाने वाला माना जा रहा है।

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