High Court Verdict Fake Salary Scam में एक अहम फैसले के तहत Chhattisgarh High Court ने साफ कर दिया कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में सजा के लिए ठोस और विश्वसनीय प्रमाण होना अनिवार्य है।
1979 से 1985 के बीच फर्जी वेतन आहरण का आरोप
यह मामला Jagdalpur के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा है, जहां (Case Background) के तहत आरोप था कि 1979 से 1985 के बीच फर्जी वेतन बिल बनाकर सरकारी राशि का गबन किया गया। इस पूरे मामले में करीब 42 हजार रुपये की अनियमितता सामने आई थी।
अधिकारियों और कर्मचारियों पर साजिश का आरोप
अभियोजन के अनुसार, तत्कालीन सीएमएचओ Dr. R.K. Sen सहित कई कर्मचारियों पर आरोप था कि उन्होंने मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए। (Accused Details) के तहत तीन सफाई कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकालने और फर्जी हस्ताक्षर व अंगूठे के निशान लगाने की बात कही गई थी।
2002 में सुनाई गई थी सजा
इस मामले में (Trial Court Decision) के दौरान निचली अदालत ने 28 जनवरी 2002 को आरोपियों को दोषी मानते हुए आईपीसी की विभिन्न धाराओं—420, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत 2-2 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
गवाहों के बयान से कमजोर पड़ा मामला
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान (Evidence Weakness) सामने आया कि गवाहों के बयान स्पष्ट और सुसंगत नहीं थे। जिन कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकाले जाने का आरोप था, उन्होंने भी यह पुख्ता तौर पर नहीं बताया कि उन्हें वेतन नहीं मिला या वे काम पर मौजूद नहीं थे।
अधीनस्थों की भूमिका पर भी उठे सवाल
अदालत ने यह भी माना कि (Court Observation) के तहत अधीनस्थ कर्मचारियों के खिलाफ कोई स्वतंत्र आपराधिक मंशा साबित नहीं हुई। वे केवल अपने वरिष्ठ अधिकारी के निर्देशों का पालन कर रहे थे, जिसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
सबूतों के अभाव में सभी आरोपी बरी
पूरे मामले की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। (Final Verdict) में ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। साथ ही जमानत पर चल रहे आरोपियों के बांड 6 महीने तक प्रभावी रखने के निर्देश दिए गए हैं।


