सीजी भास्कर, 15 मार्च। राजधानी रायपुर में ट्रैफिक सुधार को लेकर बनाई गई योजनाएं कागजों से आगे पूरी रफ्तार नहीं पकड़ (Illegal Roadside Parking) सकी हैं। शहर के बड़े तिराहों और चौराहों के आसपास 50-50 मीटर तक सड़क को नो वेंडिंग और नो पार्किंग जोन बनाने का फैसला लिया गया था, लेकिन जमीनी तस्वीर अब भी इस दावे से मेल नहीं खाती। नतीजा यह है कि कई प्रमुख इलाकों में सड़कें हर दिन अवैध पार्किंग, ठेलों, गुमटियों और सवारी भरते ऑटो के दबाव में घिर जाती हैं, जिससे ट्रैफिक की रफ्तार टूटती है और जाम आम बात बन गया है।
फरवरी में ट्रैफिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए हुई समीक्षा बैठक में दो महीने की विशेष कार्ययोजना तैयार की गई थी। इस योजना का मकसद साफ था, प्रमुख चौराहों और तिराहों के आसपास सड़क किनारे लगने वाले ठेला-गुमटी, अवैध वेंडिंग, अनियंत्रित ऑटो स्टॉपेज और बेतरतीब पार्किंग पर सख्ती की जाए, ताकि मुख्य मार्गों पर आवागमन सामान्य हो सके। लेकिन तय समयसीमा के बावजूद कई इलाकों में हालात पहले जैसे ही बने हुए हैं। दुकानों के सामने ग्राहकों की गाड़ियां खड़ी रहती हैं, ऑटो चालक बीच सड़क तक वाहन लगा देते हैं और जहां सड़क खुली रहनी चाहिए, वहीं आवाजाही सबसे ज्यादा बाधित हो रही है।
पचपेड़ी नाका इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आ रहा है। यहां बसों और ऑटो की अव्यवस्थित मौजूदगी रोजमर्रा के ट्रैफिक को बुरी तरह प्रभावित (Illegal Roadside Parking) करती है। धमतरी की ओर से आने वाली बसें साहू समाज भवन के सामने रुकती हैं और उसी दौरान ऑटो व ई-रिक्शा चालक आसपास सड़क को अस्थायी स्टैंड की तरह इस्तेमाल करने लगते हैं। जब बसें 10 से 15 मिनट तक खड़ी रहती हैं, तब सड़क का बड़ा हिस्सा घिर जाता है। ऊपर से आसपास फल और सब्जी की दुकानों के सामने ग्राहकों की गाड़ियां भी कतार में लग जाती हैं, जिससे बची हुई सड़क पर वाहन रेंगते हुए निकलते हैं।
फाफाडीह चौक की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। भनपुरी की दिशा में मुड़ते ही सड़क किनारे दुकानों की कतार और उनके आगे फैला सामान यातायात की मुश्किल बढ़ा देता है। कई जगह दुकानदारों द्वारा गन्ने के बंडल और अन्य सामान सड़क की सीमा तक रख दिए जाते हैं। इसके बीच ग्राहकों की बाइक और कारें भी वहीं खड़ी हो जाती हैं। सड़क किनारे बड़ी संख्या में ऑटो सवारी के इंतजार में लगे रहते हैं, जिससे चौक के आसपास का हिस्सा धीरे-धीरे संकरा कॉरिडोर बन जाता है और थोड़ी सी अतिरिक्त आवाजाही भी जाम की वजह बन जाती है।
रायपुरा चौक में भी रोज का दृश्य कमोबेश ऐसा ही है। महादेव घाट की ओर जाने वाले हिस्से में फल के ठेले सड़क किनारे कतार में लग जाते हैं, जबकि लाखे नगर की दिशा में अस्थायी दुकानों और खड़े ऑटो-रिक्शा के कारण रास्ता लगातार दबाव में रहता है। अंडरब्रिज के पास कई वाहन चालक रॉन्ग साइड से भी घुसने की कोशिश करते हैं, जिससे ट्रैफिक और उलझ जाता है। यही वह बिंदु है जहां अवैध पार्किंग, अस्थायी वेंडिंग और अनुशासनहीन ड्राइविंग मिलकर जाम को रोज की समस्या में बदल देते हैं।
योजना का सबसे कमजोर पक्ष इसका अधूरा क्रियान्वयन नजर आता है। जिन जगहों पर साफ-सुथरे तरीके से नो वेंडिंग और नो पार्किंग की सीमा तय होनी चाहिए थी, वहां अब भी मिश्रित और अनियंत्रित उपयोग दिखाई देता है। शहर का ट्रैफिक सिर्फ वाहनों की संख्या से नहीं बिगड़ रहा, बल्कि सड़क की उपलब्ध चौड़ाई पर लगातार हो रहे अतिक्रमण से उसकी क्षमता घट रही है। ऐसे में हर चौराहा सिर्फ मोड़ नहीं, एक बाधा बिंदु बनता जा रहा है।
जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि कार्ययोजना को चरणबद्ध ढंग से लागू (Illegal Roadside Parking) किया जा रहा है और इसके तहत चौराहों पर कर्मचारियों की तैनाती, जागरूकता अभियान और अवैध ठेले-गुमटियों को हटाने की कार्रवाई जारी है। नगर निगम और पुलिस की टीमें अलग-अलग जोन में काम कर रही हैं, लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि अभियान की गति और असर, दोनों को अभी और तेज करने की जरूरत है। जब तक चौराहों के आसपास सड़क का उपयोग स्पष्ट नियमों के तहत नियंत्रित नहीं होगा, तब तक ट्रैफिक सुधार की योजना अधूरी ही मानी जाएगी।
रायपुर के लिए यह सिर्फ ट्रैफिक प्रबंधन का मामला नहीं, बल्कि शहरी अनुशासन की परीक्षा भी है। अगर प्रमुख चौराहों के 50-50 मीटर दायरे को वास्तव में नो वेंडिंग और नो पार्किंग जोन में नहीं बदला गया, तो आने वाले दिनों में वाहन दबाव बढ़ने के साथ जाम की समस्या और विकराल हो सकती है। फिलहाल शहर के कई हिस्सों से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह यही बताती है कि फैसले हो चुके हैं, लेकिन सड़कों पर उनका असर अभी अधूरा है।





