India Diplomacy vs Pakistan : अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्षविराम के बाद दक्षिण एशिया में कूटनीतिक वर्चस्व की जंग तेज हो गई है। एक ओर जहां पाकिस्तान इस शांति प्रक्रिया का श्रेय लेते हुए खुद को ‘शांति दूत’ (Peace Maker) के रूप में पेश कर रहा है, वहीं भारत ने अत्यंत व्यावहारिक और सूक्ष्म कूटनीति (Quiet Diplomacy) के जरिए पाकिस्तान के पारंपरिक सहयोगियों को अपने पाले में लाना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान जहां बैठकों की मेजबानी में व्यस्त है, वहीं भारत ने रणनीतिक पकड़ मजबूत कर इस्लामाबाद को क्षेत्रीय राजनीति में अलग-थलग करने की बिसात बिछा दी है।
पाकिस्तान के ‘पुराने दोस्तों’ के साथ भारत की नई केमिस्ट्री
भारत की नई विदेश नीति का सबसे दिलचस्प पहलू उन देशों के साथ बढ़ती नजदीकी है जो कभी पाकिस्तान के बेहद करीबी माने जाते थे। भारत ने चार मोर्चों पर एक साथ अपनी सक्रियता बढ़ाई है:
1. तुर्की के साथ जमीनी संवाद: तुर्की और भारत के संबंधों में ‘कश्मीर मुद्दे’ के कारण लंबे समय से खटास रही है। लेकिन, हालिया विदेश कार्यालय स्तर की बातचीत (Foreign Office Consultations) यह संकेत दे रही है कि दोनों देश अब तनाव को पीछे छोड़कर आर्थिक और रणनीतिक सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं। यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका है, जो तुर्की को अपना सबसे पक्का सहयोगी मानता आया है।
2. बांग्लादेश के साथ ‘रीसेट’ मोड: बांग्लादेश के विदेश मंत्री के भारत दौरे ने ढाका और दिल्ली के बीच अविश्वास की बर्फ पिघला दी है। नई सरकार के गठन के बाद दोनों देशों ने स्पष्ट किया है कि वे आपसी सहयोग के नए अध्याय के लिए तैयार हैं। यह न केवल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भी जरूरी है।
3. अजरबैजान: आभार से बढ़ती निकटता: मिडिल ईस्ट संकट के दौरान अजरबैजान ने भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और निकासी में जो सहयोग दिया, उसने रिश्तों की नई इबारत लिख दी है। भारत के आधिकारिक आभार ने दोनों देशों के बीच सहयोग के नए द्वार खोल दिए हैं।
4. संयुक्त अरब अमीरात (UAE): गहरी होती रणनीतिक साझेदारी: विदेश मंत्री का प्रस्तावित UAE दौरा ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से गेमचेंजर माना जा रहा है। भारत और UAE का बढ़ता व्यापारिक रिश्ता पाकिस्तान की गिरती अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक साख के लिए बड़ी चुनौती है।
पाकिस्तान का मध्यस्थता कार्ड बनाम भारत की हकीकत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का मध्यस्थ बनने का प्रयास वैश्विक मंच पर अपनी प्रासंगिकता (Relevance) बचाने की एक कोशिश है। इसके विपरीत, भारत ने ‘मिडिल ईस्ट’ संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी मजबूत स्थिति का उपयोग करके तुर्की, अजरबैजान और UAE जैसे देशों को यह अहसास करा दिया है कि भारत एक विश्वसनीय और सशक्त साझीदार है।
वैश्विक नेतृत्व की दिशा में भारत
भारत के ये प्रयास दर्शाते हैं कि वह अब केवल प्रतिक्रियावादी कूटनीति नहीं कर रहा, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए सक्रिय रूप से नए गठबंधन बना रहा है। पाकिस्तान जहां केवल मेजबानी और बयानों तक सीमित है, वहीं भारत ने कूटनीतिक शतरंज की बिसात पर अपने मोहरे बेहद मजबूती से जमा दिए हैं।


