सीजी भास्कर, 11 जनवरी। रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर वैश्विक राजनीति में हलचल (India US Critical Minerals) तेज हो गई है। चीन के बढ़ते वर्चस्व को संतुलित करने की दिशा में अमेरिका ने वाशिंगटन में एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई है, जिसमें भारत की ओर से केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव भाग लेंगे। यह बैठक तकनीक, सेमीकंडक्टर और रक्षा क्षेत्र के लिए जरूरी खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने पर केंद्रित रहेगी।
सूत्रों के अनुसार, इस बैठक का मुख्य उद्देश्य चीन के उस प्रभाव को सीमित करना है, जिसके जरिए वह रेयर अर्थ एलिमेंट्स और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक सप्लाई को प्रभावित कर सकता है। अमेरिका चाहता है कि भरोसेमंद साझेदार देशों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक और स्थिर सप्लाई चेन विकसित की जाए, जिसमें भारत की भूमिका अहम मानी जा रही है।
‘पैक्स सिलिका’ में भारत की एंट्री
भारत अब अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘पैक्स सिलिका’ गठबंधन का हिस्सा बनने की दिशा में आगे (India US Critical Minerals) बढ़ रहा है। इस मंच पर जापान, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश पहले से मौजूद हैं। यह गठबंधन सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उद्योग के लिए जरूरी खनिजों की साझा रणनीति पर काम कर रहा है।
घरेलू मोर्चे पर भी तेज तैयारी
वैश्विक पहल के साथ-साथ भारत ने अपने देश में भी खनिज सुरक्षा को प्राथमिकता दी है। नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन 2025 के तहत कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की खोज और उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। राजस्थान सहित देश के विभिन्न हिस्सों में 195 नए प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है।
सरकार ने आयात निर्भरता घटाने के लक्ष्य के साथ 100 से अधिक मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी की तैयारी की है। इसके अलावा, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग ईकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए 7,280 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है। भारत रूस समेत अन्य देशों के साथ भी खनिज परियोजनाओं में सहयोग बढ़ा रहा है।
चीन का एकाधिकार क्यों बना चिंता का विषय
रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स पर चीन की पकड़ इसलिए खतरनाक (India US Critical Minerals) मानी जा रही है क्योंकि लिथियम, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे खनिजों की 47 से 87 प्रतिशत रिफाइनिंग क्षमता अकेले चीन के पास है। यदि चीन सप्लाई पर रोक लगाता है, तो इसका असर सीधे वैश्विक टेक्नोलॉजी और रक्षा विकास पर पड़ सकता है।
इसी चुनौती को देखते हुए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और भारत मिलकर एक भरोसेमंद विकल्प तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। वाशिंगटन में होने वाली यह बैठक इसी रणनीति का अहम हिस्सा मानी जा रही है, जिसमें भारत की सक्रिय भागीदारी आने वाले वर्षों में वैश्विक खनिज राजनीति की दिशा तय कर सकती है।


