सीजी भास्कर, 2 फरवरी | माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर कबीर धर्मनगर दामाखेड़ा में आयोजित Kabir Sant Sammelan Chhattisgarh में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय शामिल हुए। संतों और अनुयायियों के विशाल समागम के बीच मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ तेज़ी से विकसित प्रदेश की ओर बढ़ रहा है और सामाजिक-आध्यात्मिक संस्थानों की भूमिका इसमें अहम है।
समारोह राशि में बढ़ोतरी
मुख्यमंत्री साय ने मंच से घोषणा करते हुए दामाखेड़ा संत समागम के लिए दी जाने वाली अनुदान राशि को 50 लाख रुपये से बढ़ाकर 75 लाख रुपये कर दिया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन चुका है।
Kabir Sant Sammelan Chhattisgarh और कबीरपंथ का सामाजिक प्रभाव
सीएम साय ने कहा कि कबीरपंथ का छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर गहरा असर है। यही कारण है कि प्रदेश के लोग स्वभाव से शांतिप्रिय हैं। उन्होंने अपने बचपन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके गांव बगिया में भी कई कबीरपंथी परिवार रहे हैं, जिनसे वे आरंभ से जुड़े रहे हैं।
कबीर धर्मनगर की प्रक्रिया अंतिम चरण में
मुख्यमंत्री ने दामाखेड़ा को आधिकारिक रूप से कबीर धर्मनगर घोषित किए जाने की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया कि राजपत्र में प्रकाशन की अंतिम प्रक्रिया चल रही है और शीघ्र ही इसे औपचारिक मान्यता मिल जाएगी।
Kabir Sant Sammelan Chhattisgarh में नक्सलवाद पर बड़ा बयान
सीएम साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ के विकास में सबसे बड़ी बाधा रहा नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 31 मार्च 2026 तक प्रदेश से नक्सलवाद का समूल अंत कर दिया जाएगा और सरकार इस दिशा में तेजी से काम कर रही है।
उपमुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने संत उदित मुनि नाम साहेब के चादर तिलक को अद्भुत और आध्यात्मिक अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि कबीरपंथ सामाजिक सेवा, नशामुक्ति, वृक्षारोपण और युवा उत्थान जैसे क्षेत्रों में लगातार सकारात्मक कार्य कर रहा है।
Kabir Sant Sammelan Chhattisgarh में देश-विदेश से संतों की सहभागिता
पंथश्री प्रकाश मुनि नाम साहब ने जानकारी दी कि इस वर्ष माघ मेले में देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी कबीरपंथी संत और अनुयायी शामिल हुए। आयोजन को शासन-प्रशासन का पूरा सहयोग मिला, जिससे समागम ऐतिहासिक बन सका।
व्यापक जनभागीदारी
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संत, जनप्रतिनिधि, अधिकारी-कर्मचारी और कबीरपंथी अनुयायी उपस्थित रहे। संत समागम ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक परंपरा को मजबूती दी।





