सीजी भास्कर, 16 अप्रैल : विश्व विरासत दिवस के अवसर पर इंटैक दुर्ग-भिलाई द्वारा आयोजित ‘लोक कथा-कथन’ कार्यक्रम (Lok Katha Kathan Bhilai) ने भारतीय सांस्कृतिक विविधता को एक मंच पर जीवंत कर दिया। इस विशेष आयोजन में देश के 10 राज्यों से आए साहित्यकारों ने अपनी-अपनी लोक भाषाओं में 12 लोक कथाओं की प्रस्तुति दी। इस कार्यक्रम में ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की भावना स्पष्ट रूप से देखने को मिली, जहां अलग-अलग संस्कृतियों और परंपराओं का सुंदर संगम हुआ।
लोक कथाओं की गूंज
इस आयोजन (Lok Katha Kathan Bhilai) में 10 राज्यों के साहित्यकारों ने 12 लोक कथाएं प्रस्तुत कर भारतीय लोक परंपरा की समृद्ध विरासत को मंच पर जीवंत किया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कथाकार गुलबीर सिंह भाटिया ने लोक कथाओं के साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कथाएं हमारे साहित्य की जड़ और जननी हैं। उन्होंने ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को लोक कथा और आधुनिक कथा साहित्य के बीच सेतु बताते हुए कहा कि पुरखों की इस धरोहर को संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है।
धरोहर सहेजने की जरूरत
कार्यक्रम (Lok Katha Kathan Bhilai) में वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल युग में नई पीढ़ी लोक कथाओं से दूर हो रही है, ऐसे में इस विरासत को सहेजना बेहद जरूरी है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए छत्तीसगढ़ प्रदेश साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रवि श्रीवास्तव ने कहा कि आज का साहित्य लोक कथाओं की नींव पर टिका है। इंटैक दुर्ग-भिलाई की संयोजिका डॉ. हंसा शुक्ला ने लोक कथाओं को सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं शिक्षाविद डॉ. डीएन शर्मा ने चिंता जताई कि सोशल मीडिया के दौर में युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है।
10 राज्यों की लोक परंपराओं का संगम
इस आयोजन (Lok Katha Kathan Bhilai) में देश के विभिन्न राज्यों की लोक कथाओं के माध्यम से भारत की विविधता का अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिला। छत्तीसगढ़, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, उत्तर प्रदेश, बंगाल, राजस्थान, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के साहित्यकारों ने अपनी-अपनी लोक कथाओं के जरिए दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में प्रदीप भट्टाचार्य, डॉ. पी.सी. पंडा, महेश चतुर्वेदी सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।


