सीजी भास्कर, 02 जुलाई : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शादी का वादा (Marriage Promise Case) कर बनाए गए शारीरिक संबंधों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दो बालिग लंबे समय तक आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहे हों, तो बाद में शादी नहीं होने मात्र से उसे दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए पीड़िता की अपील शुरुआती सुनवाई (एडमिशन स्टेज) में ही खारिज कर दी।
जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान समय में कई महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने में सक्षम हैं। ऐसे में लंबे समय तक सहमति से बने रिश्तों को केवल शादी नहीं होने के आधार पर दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। अदालत को रिश्ते की अवधि, दोनों पक्षों के व्यवहार और परिस्थितियों का परीक्षण करना होगा कि संबंध पूरी तरह सहमति से था या नहीं।
क्या था पूरा मामला?
40 वर्षीय महिला ने वर्ष 2019 में आईआईएम रायपुर में एमबीए पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। इसी दौरान उसकी पहचान सहपाठी आरोपी से हुई और दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई।
महिला का आरोप था कि 5 जुलाई 2019 को आरोपी ने ग्रुप स्टडी का बहाना बनाकर उसे अपने घर बुलाया। वहां कोई अन्य छात्र मौजूद नहीं था। आरोप के अनुसार आरोपी ने शादी का भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद दोनों लंबे समय तक रिलेशनशिप में रहे।
महिला ने बताया कि जब भी वह शादी की बात करती, आरोपी उसे टाल देता था। अगस्त 2021 में आरोपी ने फोन पर बताया कि महिला के तलाकशुदा होने और ईसाई समुदाय से होने के कारण उसके माता-पिता इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बावजूद वह लगातार शादी का भरोसा देता रहा।
बाद में महिला ने पहले महिला आयोग और फिर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ चालान न्यायालय में प्रस्तुत किया।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को किया था बरी
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने पाया कि दोनों बालिग थे और लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध में रहे। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि दोनों के बीच लंबे समय तक सहमति से संबंध रहे और वे साथ भी रहे। ऐसे मामलों में केवल शादी से इनकार किए जाने के आधार पर दुष्कर्म का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं होता।
अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई ऐसी कानूनी त्रुटि या गंभीर कमी नहीं है, जिसके कारण उसमें हस्तक्षेप किया जाए। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने महिला की अपील को प्रारंभिक सुनवाई के दौरान ही खारिज कर दिया।



