Muslim Will Property Law : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम कानून से जुड़ी वसीयत व्यवस्था पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा वसीयत के जरिए तभी दे सकता है, जब उसके सभी वैध वारिस इसके लिए स्पष्ट रूप से सहमत हों। कोर्ट ने इसे मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की मूल भावना से जुड़ा मामला बताया।
विधवा के अधिकारों की अनदेखी पर सवाल
यह मामला कोरबा जिले से जुड़ा है, जहां एक विधवा को पति की संपत्ति से बाहर कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने माना कि मुस्लिम कानून में पत्नी का अधिकार प्राथमिक है और उसे केवल वसीयत के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता, खासकर तब, जब सहमति का कोई ठोस प्रमाण मौजूद न हो।
वसीयत बनाम वैध उत्तराधिकार
मामले में 64 वर्षीय जैबुननिशा ने अपने पति अब्दुल सत्तार लोधिया की संपत्ति पर दावा किया था। पति की मृत्यु वर्ष 2004 में हुई थी। इसके बाद एक रिश्तेदार द्वारा खुद को पालक पुत्र बताते हुए पूरी संपत्ति पर दावा किया गया और वसीयत के जरिए अधिकार जताया गया, जिस पर पत्नी की कोई सहमति नहीं थी।
निचली अदालतों की सोच पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए कहा कि उन्होंने कानून की गलत व्याख्या की। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक चुप रहना या देर से दावा करना, सहमति नहीं माना जा सकता। वसीयत पेश करने वाले पर ही उसकी वैधता साबित करने की जिम्मेदारी होती है।
सहमति की परिभाषा स्पष्ट
कोर्ट ने साफ कहा कि वारिसों की सहमति मौन या परिस्थिति से नहीं मानी जा सकती। इसके लिए स्पष्ट, लिखित और प्रमाणिक सहमति आवश्यक है। मुस्लिम कानून में उत्तराधिकार के अधिकारों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है और किसी भी स्थिति में इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता।
संपत्ति विवादों के लिए मिसाल
हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि भले ही वसीयत वास्तविक मानी जाए, तब भी बिना सहमति के एक-तिहाई से अधिक संपत्ति किसी एक व्यक्ति को नहीं दी जा सकती। यह फैसला आने वाले समय में मुस्लिम संपत्ति विवादों और वसीयत से जुड़े मामलों में एक मजबूत कानूनी आधार प्रदान करेगा।




