सीजी भास्कर 30 जनवरी Narmada Mela Khairagarh : खैरागढ़ जिले के नर्मदा क्षेत्र में आज से तीन दिवसीय ऐतिहासिक नर्मदा मेला महोत्सव की शुरुआत हो गई। सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही तेज रही और पूरे क्षेत्र में भक्ति व उत्सव का माहौल देखने को मिला। प्रशासन और मंदिर समिति की ओर से सभी आवश्यक तैयारियां पहले ही पूरी कर ली गई थीं, ताकि दूर-दराज से आने वाले भक्तों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
भीड़ प्रबंधन के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
मेले के दौरान हजारों श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को विशेष रूप से मजबूत किया गया है। नर्मदा कुंड, मंदिर परिसर और मेला स्थल पर पुलिस बल व स्वयंसेवकों की तैनाती की गई है। स्नान, दर्शन और आरती के समय भीड़ नियंत्रित रखने के लिए अलग-अलग प्रवेश और निकास मार्ग बनाए गए हैं।
महाआरती के साथ हुआ उत्सव का आगाज़
महोत्सव का शुभारंभ नर्मदा मैया और कुंड की भव्य महाआरती के साथ किया गया। आरती के दौरान पूरा वातावरण मंत्रोच्चार और घंटे-घड़ियाल की ध्वनि से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने कुंड में स्नान कर मां नर्मदा के दर्शन किए और सुख-समृद्धि की कामना की।
आस्था का केंद्र और ऐतिहासिक स्थल
खैरागढ़ नगर से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित नर्मदा क्षेत्र इस अंचल की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। नर्मदा कुंड से निकलने वाली गर्म जलधारा इसकी विशेष पहचान है, जो वर्ष भर निरंतर प्रवाहित होती रहती है। इसी कुंड के कारण यहां एक अलग बस्ती विकसित हुई, जिसे आज नर्मदा के नाम से जाना जाता है।
सड़क संपर्क और धार्मिक महत्व
नर्मदा क्षेत्र केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आवागमन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। यहां से राजनांदगांव, डोंगरगढ़, कवर्धा, जबलपुर, बिलासपुर और अन्य शहरों के लिए सड़क मार्ग उपलब्ध हैं। कुंड के समीप स्थित नर्मदा देवी का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण बना हुआ है।
कई देवस्थलों का संगम
नर्मदा में नर्मदा मैया के मंदिर के साथ-साथ राम मंदिर, कृष्ण मंदिर, लोधेश्वर महादेव मंदिर, कबीर कुटीर और बाबा गुरु घासीदास का जैतखाम भी स्थित है। चैत्र और कुंवार माह में यहां जंवारा बोने की परंपरा है, जहां भक्त तेल और घी की ज्योति जलाकर मनोकामना की कामना करते हैं।
कल्चुरि कालीन प्रतिमाओं का वैभव
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार नर्मदा मंदिर लगभग तीन से चार सौ वर्ष पुराना है, जबकि यहां स्थापित कई प्रस्तर प्रतिमाएं कल्चुरि काल की मानी जाती हैं। गणेश, वीरभद्र, देवी नर्मदा, बैकुंठधाम सहित अनेक मूर्तियां अपनी कलात्मक शिल्पकला के लिए जानी जाती हैं। मंदिर शिखर और जंघा भाग में मध्यकालीन अवतारों की मूर्तियां भी देखी जा सकती हैं।
माघ पूर्णिमा पर उमड़ती है आस्था
प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला यह मेला इस अंचल का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में हजारों श्रद्धालु नर्मदा स्नान और दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र श्रद्धा और उल्लास से भर उठता है।
भक्त की भक्ति से प्रकट हुई मां
स्थानीय लोककथा के अनुसार खैरागढ़ रियासत में रुक्कड़ बाबा नामक एक परम भक्त थे, जो नर्मदा स्नान के लिए पैदल मंडला जाया करते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां नर्मदा ने स्वयं खैरागढ़ अंचल में प्रकट होने का वरदान दिया। कहा जाता है कि साधारण स्त्री का रूप धारण कर आईं मां नर्मदा, खैरा क्षेत्र में जलधारा के रूप में प्रकट हुईं और तभी से यहां विराजमान हैं।
श्रद्धा, कथा और परंपरा का जीवंत उदाहरण
आज भी नर्मदा कुंड के समीप बहती गर्म जलधारा और स्थापित मूर्ति भक्तों की अटूट आस्था का प्रतीक है। यही कारण है कि हर वर्ष यह मेला केवल आयोजन नहीं, बल्कि परंपरा, कथा और विश्वास का जीवंत उत्सव बन जाता है।




