सीजी भास्कर, 16 जनवरी। समर्थन मूल्य पर धान खरीदी (Paddy Procurement Scam) को पारदर्शी बताने वाले सरकारी दावों की एक बार फिर पोल खुल गई है। खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में धान खरीदी के दौरान सामने आई व्यापक अनियमितताओं ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी सिस्टम भीतर तक सड़ चुका है। हालात इतने गंभीर पाए गए कि राज्य सरकार को 38 कर्मचारियों पर कार्रवाई करनी पड़ी, जिनमें 31 को निलंबित किया गया, तीन पर एफआईआर दर्ज हुई, एक कर्मचारी को बर्खास्त किया गया, दो को सेवा से पृथक और एक को कार्य से पृथक किया गया है।
यह कार्रवाई प्रदेश के 12 जिलों दुर्ग, बेमेतरा, कबीरधाम, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, रायगढ़, सक्ती, जगदलपुर, रायपुर, गरियाबंद, महासमुंद और बलौदाबाजार-भाटापारा—में की गई है। सवाल यह है कि अगर सिस्टम मजबूत होता, तो इतनी बड़ी गड़बड़ी आखिर कैसे पनपती?
अनियमितताओं की लंबी फेहरिस्त
खाद्य विभाग के निरीक्षण और पर्यवेक्षण में स्कंध में कमी के 5 मामले, स्कंध अधिक एवं अव्यवस्थित स्टेकिंग के 3 मामले, नीति व कार्य-निर्देशों के उल्लंघन के 4 मामले, अमानक धान खरीदी के 5 मामले, धान खरीदी में सीधी अनियमितता के 11 मामले, अवकाश के दिन खरीदी के 3 मामले सामने आए। इसके अलावा फर्जी खरीदी, टोकन अनियमितता, बिना आवक पर्ची खरीदी, किसानों से अवैध वसूली, बारदाना वितरण में गड़बड़ी और अव्यवस्था के कई मामले उजागर हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि (Paddy Procurement Scam) केवल कुछ कर्मचारियों की गलती नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की नाकामी का नतीजा है।
जिला-जिला फैली गड़बड़ी
दुर्ग जिले में स्कंध गड़बड़ी पाए जाने पर झीट, गोढ़ी, खिलोराकला, कन्हारपुर, ठेंगाभाट और मुरमुंदा उपार्जन केंद्रों के प्रभारी निलंबित किए गए।
बेमेतरा में अमानक और फर्जी धान खरीदी पर कई सहायक प्रबंधक और फड़ प्रभारी निलंबित हुए, जबकि मऊ केंद्र के सहायक प्रबंधक पर एफआईआर दर्ज कराई गई।
कबीरधाम में स्कंध कमी और बारदाना वितरण की गड़बड़ी पर निलंबन और एफआईआर की कार्रवाई हुई।
बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, रायगढ़, सक्ती, जगदलपुर, रायपुर, गरियाबंद, महासमुंद और बलौदाबाजार-भाटापारा हर जिले में कहीं अमानक धान, कहीं टोकन घोटाला, कहीं अवैध वसूली तो कहीं सीधे धान गायब होने के मामले सामने आए। महासमुंद और बिलासपुर में तो एफआईआर तक दर्ज करनी पड़ी।
कार्रवाई या नुकसान की लीपापोती?
सरकार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि कार्रवाई कर दी गई, लेकिन असली सवाल यह है कि जब (Government Negligence) इतनी साफ नजर आ रही है, तब जवाबदेही केवल निचले कर्मचारियों तक ही क्यों सीमित है? क्या यह संभव है कि इतने जिलों में एक साथ गड़बड़ी हो और उच्च स्तर के अधिकारी अनजान रहें? क्या किसानों के हक के धान की इस लूट में सिर्फ समिति प्रबंधक और ऑपरेटर ही जिम्मेदार हैं? धान खरीदी जैसे संवेदनशील और करोड़ों रुपये के सिस्टम में यह कार्रवाई बताती है कि सरकारी नियंत्रण और निगरानी व्यवस्था पूरी तरह फेल रही है। अब देखना यह है कि यह कार्रवाई वास्तव में सुधार की शुरुआत है या फिर कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई कर बड़े सिस्टम को बचाने की एक और कोशिश।


