राज्य में बिजली बिल की बकाया राशि को लेकर सियासत तेज हो गई है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि (Power Bill Dues Politics) के इस प्रकरण में नियम सबके लिए समान नहीं हैं—जहाँ आम उपभोक्ताओं पर कार्रवाई होती है, वहीं प्रभावशाली वर्ग को राहत मिलती है।
अधिकारियों से मुलाकात, जवाबदेही की मांग
कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने बिजली विभाग के शीर्ष अधिकारियों से मिलकर कहा कि कई वरिष्ठ अधिकारी, जनप्रतिनिधि और रसूखदार लंबे समय से बिल नहीं जमा कर रहे हैं। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि यह स्थिति (Electricity Bill Arrears Issue) को और गंभीर बनाती है।
दोहरा मापदंड क्यों?
नेताओं ने तर्क दिया कि जब सरकारी पदों पर बैठे लोगों को भत्ते और सुविधाएँ मिलती हैं, तो बिजली बिल चुकाने में ढील क्यों? विपक्ष का दावा है कि यह रवैया (VIP Power Bill Default) को बढ़ावा देता है और व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर डालता है।
घाटा और बोझ—किस पर?
पूर्व महापौर प्रमोद दुबे ने कहा कि विभागीय घाटा अंततः आम जनता पर बढ़े बिल और कर्ज के रूप में पड़ता है। उनके मुताबिक, समय पर वसूली न होना (State Electricity Revenue Loss) का बड़ा कारण बन रहा है।
बड़े बकायेदारों पर कार्रवाई कब?
कांग्रेस का आरोप है कि कुछ बड़े बिल्डर और व्यावसायिक उपभोक्ताओं पर लाखों रुपये बकाया हैं, फिर भी कार्रवाई नहीं हो रही। चेतावनी दी गई कि तय समयसीमा में वसूली नहीं हुई तो जनजागरूकता अभियान तेज किया जाएगा।
कर और जनसेवा पर सवाल
पूर्व विधायकों ने यह मुद्दा भी उठाया कि नगर निगम के जल-आपूर्ति बोर पर कॉमर्शियल टैक्स क्यों, जबकि यह जनसेवा है। उनका कहना है कि घरेलू उपभोक्ताओं पर भारी बकाया दिखता है, पर बड़े व्यावसायिक बकायेदारों पर सख्ती नदारद है।
अगला कदम—पारदर्शिता की मांग
कांग्रेस प्रवक्ताओं ने संकेत दिए कि बकायेदारों की सूची सार्वजनिक करने और घरों पर नोटिस चस्पा करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं, ताकि (Power Bill Dues Politics) में पारदर्शिता आए और समान नियम लागू हों।






