सीजी भास्कर, 15 नवंबर | PRSU Caste Certificate Issue | नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर पद पर हुई नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। NSUI जिला अध्यक्ष शान्तनु झा ने आरोप लगाया है कि नियुक्ति वर्ष 2003 में अनुसूचित जाति (SC) के आरक्षित पद पर हुई, लेकिन प्रस्तुत किया गया जाति प्रमाणपत्र पहले ही समाप्त हो चुका था।
झा ने इस पूरे मामले को “नियमों की अवहेलना” और procedural violation का स्पष्ट उदाहरण बताया है।
समाप्त प्रमाणपत्र पर नियुक्ति, वैधता ही खत्म थी
शिकायत के अनुसार, चयन प्रक्रिया में प्रस्तुत अस्थायी जाति प्रमाणपत्र 07/08/1999 को जारी हुआ था और उसकी वैधता 06/02/2000 तक ही थी।
इसके बावजूद नियुक्ति वर्ष 2003 में दी गई, जो NSUI के अनुसार विश्वविद्यालय प्रबंधन की गंभीर लापरवाही और नियमों के विपरीत है।
शिकायतकर्ता ने इसे administrative negligence का सीधा मामला बताया है।
22 साल में नहीं हुआ सत्यापन, RTI ने खोली परतें
RTI से मिले दस्तावेज़ों में सामने आया है कि विश्वविद्यालय ने प्रमाणपत्र सत्यापन के लिए 26/12/2022 और 27/01/2025 को पत्र भेजे, लेकिन न तो सत्यापन हुआ और न ही स्थायी प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया गया।
झा का कहना है कि इतने लंबे समय तक सत्यापन न होना इस बात का प्रमाण है कि “मामले को जानबूझकर दबाया गया, या फिर पूरी प्रक्रिया को कमजोर बनाने की कोशिश हुई।”
शासन के 11 आदेश भी अनदेखे — NSUI का आरोप
शिकायत में यह भी दर्ज है कि वर्ष 2007 से 2021 के बीच शासन द्वारा फर्जी जाति प्रमाणपत्रों पर कार्रवाई करने संबंधी government circulars जारी किए गए थे।
इसके बावजूद संबंधित प्राध्यापक पर कोई भी दंडात्मक प्रक्रिया नहीं हुई, जिसे NSUI ने “लापरवाही, मिलीभगत और भ्रष्टाचार” की श्रेणी में रखा है।
NSUI की मांग — उच्च स्तरीय समिति बनाए शासन
झा ने मांग की है कि पूरे मामले की जांच PRSU Caste Certificate Issue को ध्यान में रखते हुए उच्च स्तरीय समिति से कराई जाए।
साथ ही, प्रमाणपत्र गलत पाए जाने पर नियुक्ति रद्द करने और चयन प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों पर कार्रवाई की बात भी कही गई है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की कार्यशैली पर यह गंभीर प्रश्न है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।





