सीजी भास्कर 31 मार्च बिलासपुर में (Rape Case Verdict) ने एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर बहस छेड़ दी है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच, जस्टिस Narendra Kumar Vyas ने दुष्कर्म के एक पुराने मामले में आरोपी को बरी कर दिया, यह कहते हुए कि आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और ठोस आधार नहीं हैं।
2003 का मामला, ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
यह मामला राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव थाना क्षेत्र का है, जहां वर्ष 2003 में एक युवती ने मूलचंद नामक व्यक्ति पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी। (Case Background) के तहत आरोपी ने बाद में हाईकोर्ट में अपील दायर की।
गवाही ‘स्टर्लिंग क्वालिटी’ की नहीं, कई विरोधाभास
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पीड़िता की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है। (Court Observation) में कहा गया कि बयान में कई विरोधाभास और असंगतियां हैं, जिससे आरोपों की पुष्टि करना मुश्किल हो जाता है।
घटना के बाद साथ दिखना बना अहम बिंदु
मामले में एक अहम तथ्य यह सामने आया कि कथित घटना के कुछ दिनों बाद ही पीड़िता और आरोपी को साथ देखा गया। (Key Evidence) के तहत यह भी सामने आया कि दोनों बाद में साथ रहने लगे थे, जिसने केस की दिशा को प्रभावित किया।
रिपोर्ट में नहीं मिले ठोस सबूत
मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर पर किसी तरह की चोट के स्पष्ट निशान नहीं मिले। (Medical & FSL Report) के अनुसार, एफएसएल रिपोर्ट भी नेगेटिव रही, जिससे जबरन संबंध के आरोप को साबित करना और कठिन हो गया।
रिपोर्ट दर्ज करने में देरी पर भी उठे सवाल
घटना के करीब 8 दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई। (Delay in FIR) को लेकर अदालत ने कहा कि हालांकि देरी का कारण पंचायत बताया गया, लेकिन इससे संदेह पूरी तरह खत्म नहीं होता।
केवल गवाही से दोषसिद्धि तभी, जब हो पूरी तरह ठोस
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि तभी संभव है, जब वह पूरी तरह सुसंगत, स्पष्ट और संदेह से परे हो। (Final Judgment) के आधार पर आरोपी को बरी कर दिया गया।


